एलोरा के मंदिर का निर्माण किस काल में हुआ एलोरा की गुफा क्या है

एलोरा की गुफाओं का निर्माण किसने करवाया एलोरा का कैलाश मंदिर

एलोरा गुफा का इतिहास। एलोरा के मंदिर का निर्माण किस काल में हुआ एलोरा की गुफा क्या है। एलोरा की गुफाओं का निर्माण किसने करवाया एलोरा का कैलाश मंदिर।

यह गुफा महाराष्ट्र के औरंगाबाद से 29 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । एलोरा गुफाओं को भारतीय चट्टानों को तराशने की स्थापत्य कला का प्रतीक माना जाता है ।

इनका निर्माण पांचवी से तेरहवीं शताब्दी के बीच किया गया था । जब हम एलोरा गुफाओं के अंदर घूमते हैं । तब इन गुफाओं के संसाधनों वास्तुकला तकनीक तथा तकनीकी कौशल देखकर के हैरान रह जाते हैं।

विभिन्न धर्मों के पवित्र मंदिर है । यहां पर ब्राह्मणवादी बौद्ध तथा जैन धर्म की गुफाएं हैं । हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इन मंदिरों के संरक्षक कौन थे । लेकिन इन गुफाओं के अभिलेखों से पता चलता है कि राष्ट्रकूट तथा अन्य दानी राजाओं ने बनवाया होगा ।

ऐतिहासिक रूप से इनमें से अनेक स्मारकों का निर्माण एक अन्य राष्ट्रकूट राजा कृषण प्रथम द्वारा करवाया गया था ।

यदि हम दक्षिणी छोर से शुरू करें तो कॉल क्रम के अनुसार बौद्ध गुफाओं की संख्या 1 से 12 तक है । अधिक जटिल नक्काशीदार ब्राह्मणवादी गुफाएं 13 से लेकर गुण 29 नंबर की है । इसके बाद में आने वाली जैन गुफाओं की संख्या 30 से 34 है ।

उत्तर की ओर जाने पर गुफाएं अधिक से स्पष्ट होती जाती है । एलोरा की सबसे प्राचीन ब्राह्मणवादी गुफा 600 ईसवी की है । यह समय बौद्ध काल का मध्य युग था ।

इन बौद्ध गुफाओं को सबसे प्राचीन माना जाता है । साक्ष्य इस ओर इशारा करते हैं कि यह क्षेत्र व्यस्त व्यवसायिक मार्ग पर स्थित था । जो कि पाटलिपुत्र से उत्तर दक्षिण को जोड़ने वाला एक प्राचीन मार्ग था ।

इन सभी कारणों को देखते हुए कहा जा सकता है कि एलोरा कलात्मक धार्मिक तथा आर्थिक जीवन का एक संगम था ।

हैरान कर देने वाला तथ्य यह है की गुफाओं का उत्खनन शिर्ष से आधार की ओर किया गया है । निर्माण कर्ताओं ने पहले छत का निर्माण किया फिर नीचे के हिस्से को बनाया । यहां पर चट्टानों को बहुत ही सावधानी से तराशा गया है ।

इन पर ज्वालामुखी बेसाल्टिक संरचना है । यहां पर लोहे के बहाव से बनी नालियों को देखा जा सकता है । विशेषकर गुफा नंबर 32 में । बहुत अधिक गर्म होने के कारण इन नालियों का रंग भूरा लाल हो गया है ।

निर्माण करता ने उन स्थानों को चुना जो कि मूर्तियों की कटाई तथा चट्टानों को तराशने के लिए आदर्श थे । साथ ही चट्टानों को काटने वाले तथा तराशने वाले कलाकारों ने क्षतिज तथा उर्धवाकार परतों का भी पता लगाया । इस काम के लिए बेसाल्टिक चट्टान उपयुक्त थी ।

क्योंकि यह चट्टाने प्रारंभिक उत्खनन के दौरान नरम होती है और पर्यावरण का इन पर आसानी से कोई प्रभाव भी नहीं होता है । वास्तव में उस समय बनाए गए उपकरण तथा तकनीक आज भी उपयोगी है । इन तकनीकों का उपयोग आज भी अजंता की गुफाओं के सरंक्षण में हो रहा है ।

इस पहाड़ीयों से कई प्रमुख जल धाराएं निकलती है । जिनमें एला गंगा सबसे प्रमुख है । जो कि शिव नदी में मिलती है । शिव गोदावरी की मुख्य सहायक नदी है । एला गंगा मानसून के दौरान अपने चरम पर होती है । बैराज के ऊपर से बहने वाला पानी गुफा संख्या 29 के पास सीधा नाले के एक झरने के रूप में गिरता है ।

असल में पानी के कारण ही यह मार्ग व्यवसाय महत्वपूर्ण था । पानी की वजह से ही यह एक व्यवसायिक मार्ग बना था और यह एक व्यस्त मार्ग था

प्राचीन निर्माण कर्ताओं ने गुफाओं के दोनों ओर पानी जमा करने के शुरुआत भी बनाए थे । इन बड़े टैंकों को बनाने के लिए पत्थरों को खोज करके निकाल दिया गया । ठोस पत्रों से नालियों का जाल बनाया गया ताकि बारिश का पानी इनमें से बेहकर के टैंक में पहुंच जाए ।

यह बारिश के पानी का जल सरंक्षण करने के जैसा ही था जो कि आज के समय में बहुत ही जरूरी हो गया है ।

यहां पर बनी आश्चर्यजनक संरचना मे से 1 है कैलाश नाथ मंदिर । इसे आठवीं सदी में बनाया गया था । इसे बनाने में 100 साल लगे थे । इसे एक ही चट्टान को काट करके बनाया गया था । पूरे एलोरा में पत्थर पर लोहे की छीनियों के निशान देखे जा सकते हैं ।

यह 30 मीटर ऊंचा तथा 45 मीटर चौड़ा और 85 मीटर गहरा है । इस मंदिर को तीनों तरफ से पहाड़ियों से गिरे एक विशाल चट्टान को 3 विशाल खाईयो को तराश करके बनाया गया है ।

मंदिर की बाहरी दीवार काफी चौड़ी है । इसमें लंबवत अनेख कक्ष बने हैं । जिन पर नृत्य करते हुए शिव तथा गरुड़ पर सवार विष्णु की मूर्तियां बनी है । कैलाश मंदिर की स्थापत्य कला की जटिलता को समझने के लिए इसकी वास्तुकला को समझना बहुत जरूरी है ।

मंदिर के मुख्य प्रांगण में 16 स्तंभों वाला मंडप है ।एक नंन्दी मंडप है और एक गोहपुर है । जिसे मंदिर के शीर्ष पर बनाया गया है । यह सभी एक ही चट्टान से निर्मित पुलों से जुड़े हैं । इसे एकल चट्टान में कहीं भी एक भी जोड़ नहीं है ।

पुल के दोनों ओर स्थित सीढ़ियां मुख्य मंदिर को मंडप से जोड़ती है । सीढ़ियां की उतरी दीवार पर महाभारत की कहानियां उकेरी हुई है । दक्षिण दिशा में रामायण के दृश्यों को देखा जा सकता है ।

बरामदे के दक्षिणी तरफ एक तीन मंजिला गुफा है । इसकी संरचना में बालकनी तथा सीढ़ियां है । यह मूर्तियां जीवन दृश्य को व्यक्त करती है और इसमें जीवन की तृष्णा को समझाया गया है ।

इस मंदिर में विश्व की सबसे बड़ी कैंटीलेवर्ड छत है । इस मंदिर के बाहरी हिस्सों पर चट्टानों पर उकेरी गई सैकड़ों मूर्तियां है । शुरुआत में पूरे मंदिर पर सफेद प्लास्टर था । जिसके कारण यह बर्फ से ढके कैलाश मंदिर की तरह दिखाई देता था ।

एलोरा गुफाओं में वैसे भी कई सुंदर चित्र है । जैसे कि अजंता की गुफाओं में है । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कर्ताओं को एक से अधिक परतो वाले चित्र एक ही गुफा में मिले हैं ।