क्या है 1988 का ऑपरेशन कैक्टस क्या है भारत का ऑपरेशन कैक्टस

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ऑपरेशन कैक्टस 1988 ऑपरेशन कैक्टस

क्या है 1988 का ऑपरेशन कैक्टस क्या है भारत का ऑपरेशन कैक्टस

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श्रीलंकन नेता उमा महेश्वर मालदीप के व्यापारी अब्दुल्लाह लथुफी से से मिलने उनके फार्म पर आए । उसने अब्दुल्लाह लतीफी को मालदीव के राष्ट्रपति पद की पेशकश की । जिसके बदले उस तख्ता पलट का साथ देना था ।

लतीफी ने प्रस्ताव पर विचार किया वह इतने अच्छे मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे । उसने उमा महेश्वर से हाथ मिला लिया । मौजूदा मालदीव सरकार को उखाड़ फेंकने की योजना बनाई गई । लेकिन दुनिया यह नहीं जानती थी कि भारत इस योजना का बड़े ही शानदार तरीके से जवाब देगा ।

भारत उन 6 देशों में से एक था , जिसने मुसीबत में फंसे राष्ट्रपति गय्यूम के एसओएस का जवाब दिया । इस ऑपरेशन का नाम कैक्टस रखा गया और यह है इसकी पूरी दास्तां । ऑपरेशन कैक्टस ।

ऑपरेशन कैक्टस 1988 द मालदीव

ऑपरेशन कैक्टस 1988 द मालदीव । मालदीव एक छोटा सा देश है । जिसमें 200 के लगभग दीप है । यह श्रीलंका के दक्षिण में स्थित है । इसकी राजधानी माले 2 वर्ग मील में फैली हुई है । मालदीव अपने साफ-सुथरे समुद्र की वजह से बहुत सारे टूरिस्ट को आकर्षित करता है ।

लेकिन भारत के लिए इस देश का अलग ही महत्व है । यह हमारा बहुत ही महत्वपूर्ण पड़ोसी है । किसी भी हालत में मालदीव को हम से अलग नहीं होने देना चाहिए । भारत के सभी मालवाहक जहाज करीब मालदीव से होकर के गुजरते हैं । भारत ने ऐसे कदम उठाए हैं ताकि चीन हिंद महासागर पर अपना कब्जा ना जमा पाए ।

मालदीव 1965 में अंग्रेजों से आजाद हुआ था और राष्ट्रपति गय्यूम इस देश के दूसरे राष्ट्रपति थे । उन्होंने 1978 में इब्राहिम नाजी के बाद पद संभाल लिया था जो कि बाद में देश छोड़ कर के चले गए थे ।

1980 और 1986 में उनका तख्ता पलटने की दो नाकाम कोशिशें

1980 और 1986 में उनका तख्ता पलटने की दो नाकाम कोशिशें की गई । 3 नवंबर 1988 को की जाने वाली कोशिश उनका तख्ता पलटने की तीसरी कोशिश थी । यह एक जबरदस्त साजिश थी । जिसमें लथुफी को राष्ट्रपति बनाने का वादा किया गया था ।

क्योंकि इसके बाद में श्रीलंका और भारत में गन , ड्रग्स तथा गोल्ड की स्मगलिंग कर सकता था । मालदीव कभी नहीं चाहते थे कि हमारे आसपास में हिंसा और जोर जबरदस्ती से तख्ता पलटने की कोशिश की जाए ।

3 नवंबर 1988 से 2 दिन पहले सुबह की अब्दुल्ला लथुफी के नेतृत्व में 80 लोगों के समूह ने दो फिशिंग बोट का अपहरण कर लिया । दो तरह के लोग इस काम के लिए इकट्ठा हुए थे ।

एक तो वह है जो राष्ट्रपति जी से नाराज थे और उन्हें हटाना चाहते थे । कुछ लोग सिस्टम को ही बदलना चाहते थे । दोनों साथ मिलकर के काम कर रहे थे ।

3 नवंबर 1988 अब्दुल्ला लथुफी

विद्रोहियों का एक ग्रुप रेडियो और दूरसंचार की तरफ बढ़ा । उसे बाहर से बंद कर दिया गया था । क्योंकि उस दिन छुट्टी थी । बाहर विद्रोही गोलीबारी कर रहे थे और गेट पर विस्फोटक लगा रहे थे । लेकिन गेट को कोई फर्क नहीं पड़ा और दूरसंचार को भी कोई फर्क नहीं पड़ा और वह सुरक्षित था ।

विद्रोहियों का दूसरा ग्रुप रिपब्लिक स्क्वायर पर खड़ा हुआ । वह राष्ट्रपति भवन पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे थे । उन्हें यह नहीं पता था कि राष्ट्रपति ने भारत का दौरा अचानक से रद्द कर दिया है । अचानक से राष्ट्रपति गय्यूम ने भारत के दौरे को रद्द कर दिया था ।

उन्हें पहले ही एहसास हो गया था कि कुछ गलत होने वाला है । उन्होंने राजीव गांधी को फोन करके उस दौरे को स्थगित करवाया था । मालदीव में सुबह-सुबह मस्जीद से आने वाली आजान से नींद खुलती है । लेकिन 3 नवंबर 1988 को लोगों की नींद गोलियों की आवाज से खुली ।

दुनिया के सबसे पसंदीदा टूरिस्ट पैलैस बनने जा रहे पैलेस पर सुबह-सुबह गोलियां चलने की क्या वजह हो सकती है । क्या यह तख्ता पलट है । यदि यह सच है तो इसके पीछे कौन है ।

वहां पर कुछ विद्रोही थे । जिनकी की संख्या के बारे में कुछ पता नहीं था । गोलाबारी चल रही थी तथा कुछ लोग मारे भी गए थे । एनएसएस हेड क्वार्टर में तैनात कुछ लोगों ने देखा तो वह समझ गया कि यह लोग वहां के निवासी नहीं है । मालदीव खतरे में था ।

नेशनल सिक्योरिटी फोर्स में मालदीव की आर्मी , फायर ब्रिगेड तथा सभी सुरक्षा ग्रुप शामिल होते हैं । एनएसएस पर कब्जा करने का मतलब मालदीव पर कब्जा करने के जैसा ही था । उस समय एनएसएस की कुल संख्या 2000 के करीब थी । एनएसएस हेड क्वार्टर की बिल्डिंग के अंदर जितने लोग मौजूद थे उनकी संख्या 150 से 200 थी ।

एनएसएस के आदम हुसैन

वह लोग उतने ट्रेंड नहीं थे । उन्होंने कभी भी ऐसे ऑपरेशन का सामना नहीं किया था । एनएसएस के आदम हुसैन अपने देश को बचाने के लिए विद्रोहियों के सामने सीना तान के खड़ा था । वह पहला नागरिक था जिसने देशवासियों को गोलाबारी से आगाह किया । वह अकेला विद्रोहियों का रास्ता रोके हुए था ।

गोलियों की बौछार ने उसकी जान ले ली । उनकी जिंदगी और मालदीव की आजादी दोनों का खात्मा हो गया । वह देश जो विकसित हो रहा था और दुनिया में मान्यता प्राप्त करने की कोशिश कर रहा था उस पर हथियारों से लैस आतंकवादियों ने कब्जा कर लिया था ।

वहां पर चेतावनी देने की कोई व्यवस्था भी नहीं थी । उस इलाके में गश्त की भी कोई व्यवस्था नहीं थी । इसी कारण से विद्रोहियों को इस चीज का पूरा फायदा मिला । मालदीव को अपनी सुरक्षा का मौका ही नहीं मिला । राष्ट्रपति भवन पर विद्रोही हमला कर रहे थे । राष्ट्रपति गय्यूम को मालूम था कि खतरा उनके सिर पर मंडरा रहा था ।

वह अपने सुरक्षा सलाहकार की मदद से पश्चिमी गेट से निकलकर के बच गए । गय्यूम इमारतों से होते हुए उप रक्षा मंत्री के के घर गए । जो कि उन्हें एक सुरक्षित जगह पर ले गए । लेकिन उप रक्षा मंत्री की किस्मत अच्छी नहीं थी । अपने घर आते हुए हथियारों से लैस विद्रोहियों ने मशीन गन से विद्रोहियों ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी ।

किसी तरह लियास इब्राहिम अपने घर पहुंच गए । वह बुरी तरह घायल हो गए थे । उनके शरीर से खून बह रहा था और उन्हें फौरन मदद की जरूरत थी । उनको मदद मिलना बहुत ही मुश्किल था । क्योंकि पूरे शहर पर विद्रोहियों ने कब्जा कर रखा था ।

यह कोई भी नहीं जानता था कि उनके पास किस तरह के हथियार हैं । कुछ लोग कहते थे कि 800 तक विद्रोही हैं । उनके पास छोटे हथियार तथा हाथगोले हैं । मालदीव के विदेश सचिव इब्राहिम जाकि कई देशों को फोन कॉल कर रहे थे । जिनमें ब्रिटेन , अमेरिका सिंगापुर , पाकिस्तान , श्रीलंका और भारत शामिल थे ।

मालदीव के ऊपर हमला हुआ

मालदीव के ऊपर हमला हुआ था । लेकिन मालदीव सरकार में कोई भी यह नहीं जानता था कि इसके पीछे किसका हाथ है । अब तक एसओएस कॉल का जवाब भी ज्यादा खुशनुमा नहीं था । पाकिस्तान और श्रीलंका ने अपने कैपेबल ना होने की बात कहते हुए इनकार कर दिया । सिंगापुर ने भी ऐसा ही किया ।

ब्रिटेन ने कहा कि भारत से मदद मांगो । क्योंकि यह इलाका उसके हक में है । अमेरिका ने कहा कि यह एरिया उस से 1000 किलोमीटर दूर है ।सेना को मालदीव पहुंचने में एक-दो दिन का वक्त लग सकता है । बचाव दल को माले शहर में पहुंचने में कुछ ज्यादा वक्त भी लग सकता है ।

तभी भारत का जवाब हां में आया । वक्त बहुत कम था । प्रधानमंत्री राजीव गांधी कोलकाता से वापस आ रहे थे उन्होंने साउथ ब्लॉक में तत्काल एक बैठक बुलाई ।
इब्राहिम जाकी ने प्रधानमंत्री को कॉल किया । जाकि ने बताया कि विद्रोही उनके घर के सामने स्थित टेलीफोन एक्सचेंज पर कब्जा कर रहे हैं और वह नहीं जानता था कि टेलीफोन लाइन कब तक काम करेगी ।

उस समय बहुत कम टेलिफोन लाइन काम कर रही थी उस समय यदि पहला कॉल काटते हैं और दूसरा कॉल लगाते हैं तो एक लाइट ऑन ऑफ होगी जिससे ध्यान उस तरफ जा सकता है और सॉरी संचार व्यवस्था खतरे में पड़ सकती है ।

विद्रोहियों के कब्जे में फंसे मालदीव और भारत के प्रधानमंत्री

यह फोन कॉल विद्रोहियों के कब्जे में फंसे मालदीव और भारत के प्रधानमंत्री के बीच पूरे ऑपरेशन कैक्टस के दौरान संपर्क की एकमात्र लाइन थी । एक ऐसी कॉल जिसे 18 घंटे तक बंद नहीं किया गया था ।

प्रधानमंत्री के साथ हुई बैठक में यह फैसला लिया गया कि इस ऑपरेशन का नेतृत्व करने के लिए पैरा ब्रिगेड से बेहतर और कुछ नहीं है । पैराशूट ब्रिगेड को अक्सर पैरा ब्रिगेड कहा जाता है ।

जिसके जवान सिर्फ हवा से छलांग ही नहीं लगाते हैं बल्कि जबरदस्त काबिलियत और बहादुरी के साथ जमीन पर भी अपने कार्य को अंजाम देते हैं । इस ऑपरेशन में तीनों सेनाओं के बीच तालमेल होना बहुत जरूरी होता है ।

वहां पर बहुत ही संकड़ी 3 किलोमीटर लंबी हवाई पट्टी है । जिसकी चौड़ाई सिर्फ 500 मीटर है । हवाई पट्टी के अलावा दूसरा समतल मैदान एक फुटबॉल मैदान था । दोनों जगह उतरने के लिए सही नहीं लग रही थी । क्योंकि हवा की गति लगभग 20 किलोमीटर प्रति घंटा होगी । जिसकी वजह से पैरा कमांडो का उतरना लगभग नामुमकिन था । समुद्र में गिरने की संभावना बहुत ज्यादा थी ।

एयरक्राफ्ट से उतरने की हाइट ढाई सौ मीटर की होती है । जितनी ऊंचाई से कुदोगे हवा उतनी ही दूर ले जाएगी । पैराशूट में ऐसा कोई तरीका नहीं होता है कि जिससे आप पानी में उतर सके । आप इसे पानी में नहीं उतार सकते हैं । यदि आप पानी में उतारते हैं तो आपके पास 27 किलोग्राम का पैराशूट होगा 15 से 20 किलो तक हथियार और गोला-बारूद होंगे । ईतना वजन उठा कर तो कोई भी चल नहीं पाएगा ।

नवंबर 1988 में हुए कई चमत्कारों में से यह एक चमत्कार

माले जाने के लिए तीन एयरक्राफ्ट को 62 टन ईंधन से भरवा दिया । नवंबर 1988 में हुए कई चमत्कारों में से यह एक चमत्कार था । जहाज में ईंधन भरने तथा हथियारों की योजनाएं बनाने का काम भी एक साथ चल रहा था।

ब्रिगेडियर बुलसारा इस टीम का नेतृत्व करेंगे जो कि माले की तरफ जा रही थी । करनल सुभाष जोशी इसके कमांडिंग ऑफिसर होंगे । तत्काल में शॉर्ट पैरा टिम सहायता के लिए तैयार थी । करीब 400 लोग पहली दो उड़ानों में मालदीव पहुंचेंगे ।

6 पैरा कमांडो 3 पैरा कमांडो के 160 जवानों को हुलहुले एयरपोर्ट की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई । 6 पैरा कि एक कंपनी माले जाएगी । दूसरी कंपनी रूपेंद्र की कंपनी के साथ मिलकर के हुलहुले हवाई अड्डे को सुरक्षित कर देगी । जब तीसरी कंपनी आएगी वह बाकी के सारे काम पूरे करेगी ।

फैसला किया गया कि एटीसी द्वारा रनवे की लाइट को स्विच ऑन ऑफ करना पहला काम रहेगा । दूसरा सिग्नल एचयूटीआईअ दूसरा पासवर्ड था । अगर किसी वजह से पासवर्ड ना दिया जा सके और हवाई अड्डे पर विरोधी हो तब हवाई अड्डे पर कब्जा करने के लिए 60 लोगों को नीचे उतारा जाएगा ।

सिक्स पैरा की एक कंपनी को माले के दक्षिण पश्चिम में जाकर के राष्ट्रपति गय्यूम को बचाना है । ताकि वहां पर सुरक्षित रूप से उतरा जा सके ।

हुलहुले में सभी इकट्ठा होंगे । सिक्स पैरा सभी का साथ देकर के मजबूती देंगे । राष्ट्रपति गय्यूम को जल्द से जल्द सुरक्षित करना ।

मालदीव के राष्ट्रपति गय्यूम

लूटमार शुरू हो गई थी । सबसे पहले बैंकों को लूटा गया था । लोग डरे हुए थे । वह शिकार नहीं बनना चाहते थे । मालदीव के लोगों ने मुश्किल के समय में भारत को याद किया था ।

भारत की शानदार सेना, बिना वक्त गंवाए इस मुश्किल काम में जुट गई । इस तैयारी में बहुत सा वक्त लगता है । लेकिन यह सारा काम बहुत तेजी से किया गया ।
मुश्किल की घड़ी तो तब आई जब ऑपरेशन के लिए नक्शे को चुनना था जो कि मालदीव के हुलहुले एयरपोर्ट के बारे में जानकारी दे सके । इस एयरपोर्ट को भारतीय कंट्रक्शन कंपनी ने ही बनाया था । उसकी दिशा उत्तर दक्षिण ही थी।

यह दिन मिस्टर भाटिया के लिए बहुत ही अहम दिन था । उनकी पत्नी उनसे कभी भी कुछ भी नहीं पूछती थी । उस दिन उसका बेटा जो कि खुद एक पैराट्रूपर है मिस्टर भाटिया की जीफ के आगे खड़ा हो गया । पहली बार उसके बेटे ने उसको रोकने की कोशिश की थी ।

हवाई जहाज उड़ने के लिए तैयार था । तभी आखिरी समय में एक और मुश्किल खड़ी हो गई ब्रिगेडियर बुलसारा आगे रहे करके अपने जवानों को लीड करना पसंद करते थे । लेकिन वह उस जहाज में थे जिसे बाद में उड़ना था । बुलसारा ने मेजर भाटिया को पायलट को समझाने के लिए भेजा ।

मालदीव के हुलहुले एयरपोर्ट के बारे में जानकारी

398 इंसान पहली बार ऐसा काम करने जा रहे थे । जिसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी । ऑपरेशन कैक्टस आधिकारिक रूप से शुरु हो चुका था । कोरल पानी के नीचे थे । बिल्कुल कैक्टस की तरह सख्त थे । कैक्टस तथा कोरल आपस में जुड़े हुए थे । इस बात पर किसी ने सुझाव दिया कि इस ऑपरेशन का नाम कैक्टस होना चाहिए ।

पिछले 10 घंटे से मालदीव पर विद्रोहियों का कब्जा था । अभी तक किसी दूसरे देश ने सहायता की पेशकश नहीं की थी और ज्यादा विद्रोहियों के यहां पर पहुंचने की संभावना थी । उम्मीद के बावजूद भी भारतीय सेना को तख्तापलट की इस कार्रवाई से उभरना कोई आसान काम नहीं था ।

राष्ट्रपति की जिंदगी के साथ साथ मालदीव का लोकतंत्र भी खतरे में

जहाज भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर से चुपचाप उड़ते रहे । कुछ ही घंटों के बाद बीबीसी ने यह खबर दे दी कि भारत मालदीव की सहायता के लिए निकल चुका है । भारत मालदीव पहुंच गया था । राष्ट्रपति की जिंदगी के साथ साथ मालदीव का लोकतंत्र भी खतरे में था ।

भारतीय पैराट्रूपर्स और सेना अब मालदीव में थे । राष्ट्रपति की सुरक्षा को लेकर के बहुत ज्यादा चिंतित थे । ब्रिगेडियर बलसारा और कर्नल जोशी की अगुवाई में 398 पैराट्रूपर्स नीचे उतरे । ब्रिगेडियर ने दो स्थानीय लोगों को एक तरफ छुपे हुए देखा । उनमें से एक के पास रजिस्टर का ।

मालदीव के लोगों के लिए सबसे अच्छी बात तो यह थी कि फोन कनेक्शन और रेडियो चालू था । यह चीज बहुत ही कमाल की थी । विद्रोही रेडियो तथा दूरसंचार पर कब्जा नहीं कर पाए थे । मालदीव में पहुंचे भारतीय सैनिकों की खबर पूरे देश में फैल चुकी थी ।

लेकिन विद्रोही अभी भी इस बात से अनजान थे । वह ताकत के नशे में चूर थे । विद्रोही राष्ट्रपति भवन में घुसने में कामयाब हो गए थे । लेकिन सौभाग्य से राष्ट्रपति वहां से सुरक्षित निकल चुके थे ।

शिक्षा मंत्री अहमद मुस्तफा और उसकी सास

लेकिन उनकी शिक्षा मंत्री अहमद मुस्तफा और उसकी सास को पकड़ लिया गया था । ब्रिगेडियर बुलसारा तथा बनर्जी राष्ट्रपति से संपर्क स्थापित करने के लिए एटीसी में गए । हम आपके देश में पहुंच चुके हैं जो मदद आप चाहते हैं वह हम साथ लेकर आए हैं ।उन्होंने एटीसी के द्वारा यह संदेश पहुंचाया।

राष्ट्रपति ने ब्रिगेडियर बुलसारा को सब कुछ अपने कब्जे में लेने के लिए कहा । ब्रिगेडियर बुलसारा समझ गए कि भले ही हुलहुले अभी सुरक्षित है । लेकिन माले सुरक्षित नहीं है । ब्रिगेडियर बुलसारा ने सैनिकों को जल्द ही माले जाने के लिए विभाजित किया ।

27 पैरा कमांडो को माले जाने के लिए तैयार किया । ताकि वह राष्ट्रपति कयूंग को सुरक्षित यहां पर ला सकें भारतीय सैनिकों की मौजूदगी में कयुंग को कुछ भी आंच नहीं आनी चाहिए ।

उप रक्षा मंत्री ने एक गाइड को सैनिकों के साथ राष्ट्रपति के घर की तरफ रवाना कर दिया । लेकिन यह पर्याप्त नहीं था । क्योंकि गेट पर खड़े एनएसएस सैनिकों को भरोसा नहीं था कि यह सैनिक भारतीय सेना से है ।

राष्ट्रपति सुरक्षित थे । लेकिन शिक्षा मंत्री और उसकी सास विद्रोहियों के हाथों में थी । माले पर पूरी तरीके से कब्जा करना जरूरी था । हालांकि पूरा लक्ष्य 7:30 घंटे में काबू में कर लिया गया था लेकिन फिर भी भारतीय सैनिकों के लिए यह ।

लेकिन मालदीव की राजधानी माले अभी भी भारतीय सेना के नियंत्रण में नहीं थी । लथुफी का कोई भी अता पता नहीं था और विद्रोही पूरे शहर में बेधड़क घूम रहे थे।

सबसे पहले बनर्जी की नजर समुद्र में चमक रहे एक जहाज पर पड़ी । तभी पता चला कि लतीफी ने माले बंदरगाह से एक जहाज का अपहरण कर लिया है । उसमें 70 विद्रोही तथा सात बंधक थे । इसमें मालदीव के शिक्षा मंत्री तथा उसकी सास भी शामिल थी ।

ब्रिगेडियर बुलसारा

ब्रिगेडियर बुलसारा ने हमले का हुक्म दिया । जैसे ही आदेश मिला सब ने जहाज पर अंधाधुंध गोलियां चलाना शुरू कर दी । भारतीयों ने जहाज पर 3 वार किए जिनमें से एक ने काफी नुकसान भी पहुंचाया था ।

लथुफी को पकड़ना इस मिशन का आखिरी फैसला था । विद्रोही बहुत सारी कीमती चीजों को हिंद महासागर में फेंक रहे थे । फिर भारतीय सेना ने उसे अपने काबू में किया और सम्मान सहित मालदीव सरकार को होने लौटा दिया । वहां पर कुछ आवश्यक कागजी कार्रवाई कि जो कि करना जरूरी था ।

राष्ट्रपति गय्यूम ने राजीव गांधी को कॉल किया । भारतीय सेना के काम से खुश होकर के उन्हें बहुत धन्यवाद दिया । राष्ट्रपति गय्यूम ने आदेश दिया कि ऑपरेशन को खत्म कर दिया जाए । लेकिन ब्रिगेडियर बुलसारा एक सच्चे सिपाही के साथ सावधानी बरतना चाहते थे ।

उन्होंने देश की नौकाओं के साथ मिलकर के एक ऐसा घेरा बनाया । ताकि एक भी विद्रोही बच के निकल ना सके । 4 नवंबर को एक एयरक्राफ्ट ने समुद्र में एक लाइट को देखा । उस नाव ने दिशा बदलने की बहुत कोशिश की । लेकिन किस्मत लथुफी के साथ में नहीं थी ।

लथुफी को आत्मसमर्पण की चेतावनी

लथुफी को आत्मसमर्पण की चेतावनी दी गई थी । लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ । भारतीय सेना ऐसी हरकतों को बर्दाश्त नहीं करती है । सेना ने उन पर हमला किया । जिससे कि जहाज का अगला हिस्सा टूट गया । अब विद्रोह के बचने की कोई उम्मीद नहीं थी । कुछ विद्रोहियों ने नाव से छलांग लगा ली । जबकि कुछ गोलाबारी से मर गए ।

मालदीव के मंत्री तथा उसकी सास को बचा लिया गया लथुफी के तख्ता पलट की कोशिश को भारतीय सैनिकों ने पूरी तरह से खत्म कर दिया था । ऑपरेशन कैक्टस आधिकारिक रूप से सफल हुआ । लथुफी का सपना टूट गया । भारतीय सेना ने वह काम किया जो पहले कभी नहीं किया गया था ।

उन्होंने अनजान इलाके में जाकर के शानदार काम किया । जिसे देखकर बाकी दुनिया हैरत में पड़ गई । ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने भी इस पर टिप्पणी की भारत के लिए ईश्वर का आभार । राष्ट्रपति कयुंग की सरकार बचाई गई ।

लथुफी को तख्तापलट की कोशिश को के लिए मृत्यु की सजा

लथुफी को तख्तापलट की कोशिश को के लिए मृत्यु की सजा सुनाई गई थी । बाद में गय्यूम ने उसकी सजा को उम्र कैद की सजा में बदल दिया । सेना , नौसेना तथा वायु सेना ने मिलकर के काम किया । यह तीनों सेनाओं का मिलाजुला एक ऑपरेशन था ।

नवंबर 1988 में भारतीय सेना ने जो किया वह सेना , सैन्य सेना के रूप में दुनिया के सामने चेहरा बदल कर के रख दिया । इस ऑपरेशन में उन्हें एक ताकतवर शक्ति के रूप में उभर करके दिखा दिया । भारतीय सैनिकों ने आनसुनी तथा अप्रत्याशित रूप से कार्य करके दुनिया को हैरत में डाल दिया । इतने बड़े ऑपरेशन को इतनी जल्दी अंजाम में पहुंचा करके भारत ने अपना लोहा मनवा लिया ।