भारत और पाकिस्तान के बीच में बनी लाइन एलओसी के बारे में रोचक जानकारी

एलओसी ( LOC ) के बारे में रोचक जानकारी एलओसी की फुल फॉर्म ।

भारत और पाकिस्तान के बीच में बनी लाइन एलओसी ( LOC ) जिसे लाइन ऑफ कंट्रोल भी कहते हैं । एलओसी ( LOC ) के बारे में रोचक जानकारी एलओसी की फुल फॉर्म ।

सन 1947 में एक देश बांटा और दो मुल्क बने । जल्द ही दोनों में जंग छिड़ गई । फिर यूनाइटेड नेशन ने युद्धविराम करवाया । जल्द ही दोनों के बीच मोर्चा की लाइन युद्ध विराम की लाइन बन गई । बाद में वही बन गई नियंत्रण रेखा । यानी कि लाइन ऑफ कंट्रोल ।

यह लाइन मैदानों पहाड़ों बर्फीली चोटियों से होकर गुजरती है । दुनिया में शायद ही कहीं ओर इतनी सेना तैनात है , जहां यहां । लाखों जवान इस सैकड़ों किलोमीटर लंबी लाइन की चौकसी करते रहते हैं । हर घंटे , साल भर जमीन पर और आसमान से भी ।

यह एक चूहा बिल्ली का खेल है जो कि दोनों देश खेलते रहते हैं । चुनौतियां रणनीतियां और हथियार और टेक्नोलॉजी यही सब हम लाइन ऑफ कंट्रोल पर दिखाने जा रहे हैं ।

अगस्त 1947 को भारतीय उपमहाद्वीप के दो हिस्से हुए और तब भारत और पाकिस्तान बने । ब्रिटिश शासक खत्म हुआ । लेकिन दोनों देशों के बीच बगावत के बीज बो दिए गए । वह आज तक पनप रहे हैं ।

उसका नजारा हम आज भी भारत के राज्य जम्मू और कश्मीर के अखनोर जिले के बॉर्डर पोस्ट पर देख सकते हैं । भारत और पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा यहीं पर खत्म होती है । यहीं से सेना का 440 किलोमीटर लंबा रास्ता शुरू होता है । जिसे लाइन ऑफ कंट्रोल कहते हैं ।

एलओसी रेखा कहां से गुजरती है ?

लाइन ऑफ कंट्रोल यानी कि एलओसी जम्मू कश्मीर राज्य से गुजरती हुई सियाचिन ग्लेशियर की तलहटी पर मौजूद NJ9842 तक जाती है । इस लाइन को नक्शे पर तो स्पेस्ट पर दिखाया गया है लेकिन जमीन पर वह नजर नहीं आती है ।

यह एक सक्रिय मोर्चा है । दोनों मुल्कों की सेनाएं एक दूसरे पर नजर रखती है और अंगुलियां हमेशा ट्रिगर पर ही होती है । भारत का राज्य जम्मू और कश्मीर सन 1947 से ही झगड़े का मुद्दा बना हुआ है । पटवारि के बाद हिंदुस्तान और पाकिस्तान दो स्वतंत्र देश बन गए । लेकिन फौरन ही पाकिस्तान ने आजाद जम्मू और कश्मीर पर हमला कर दिया । उस समय राज्य के शासक महाराजा हरि सिंह उस हमले के लिए तैयार नहीं थे ।

पर उन्होंने हिंदुस्तान से मदद मांगी । पहले दौर का यह संघर्ष लगभग 14 महीने तक चला । 1948 के मध्य तक दोनों देशों के बीच मोर्चे की लाइन बना दी गई । उस समय तक जो खंदके खोदी गई थी वह 1 जनवरी 1949 को युद्ध विराम की लाइने बना दी गई थी । यानी कि सीजफायर लाइन का आखिरी छोर बन गई वह सीजफायर लाइन 1947 में बनाई गई अंतरराष्ट्रीय सीमा से केई किलोमीटर अंदर की तरफ थी ।

भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध कब कब हुआ ?

भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 में और फिर 1971 में भी युद्ध हुआ । उस युद्ध के बाद बांग्लादेश बना । जो कि पहले पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था । दिसंबर 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल अ ऐके नियाजी ने हिंदुस्तान के ईस्टर्न थिएटर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जेएस अरोड़ा के सामने समर्पण के कागजात पर दस्तखत किए ।

फिर जुलाई 1972 में शिमला समझौता हुआ । जिसके तहत दोनों मुल्क इस बात पर राजी हुए वह सैनिक मोर्चा अब राजनीतिक और सैनिक लाइन होगी । इसके बाद सीजफायर लाइन आ गई । जो बनी लाइन ऑफ कंट्रोल ।

मगर शांति का वह भ्रम जल्द ही टूट गया । 1989 में जब सोवियत सेना अफगानिस्तान में हारी तब पाकिस्तान के उग्रवादी उस युद्ध से मुक्त हो गए । वहां पर उनको उग्रवादीयों को हथियार के साथ भारत के राज्य जम्मू और कश्मीर में घुसपैठ की ट्रेनिंग दी जाने लगी । पूरे एलओसी पर इन लड़ाकू ने एक युद्ध छेड़ दिया ।

1999 में यह लड़ाइयां और भी तेज हो गई । पाकिस्तानी सेना के उग्रवादी भी उनकी पोशाक पहनकर भारत में घुसपैठ करने लगे । एलओसी के पार भारत के लद्दाख के क्षेत्र में आ गये और पहाड़ों मैं बने बंकरो में बैठ गए । उनका इरादा था लेह श्रीनगर के मार्ग को काटकर के लद्दाख को अलग-थलग कर देना ।

एलओसी की रक्षा के लिए भारत सरकार ने क्या कदम उठाए ?

इससे एलओसी की अहमियत ही खत्म हो जाती । मगर भारत के जवानों ने उन घुसपैठियों को मार भगाया और पहाड़ों पर फिर से अपना कब्जा बना लिया । उसके बाद भारत सरकार ने वहां पर बाड़ लगाने का काम शुरू किया ताकि घुसपैठ रोकी जा सके ।

आज एलओसी की रक्षा का जिम्मा है जम्मू-कश्मीर में तैनात सेना के नॉर्थन कमांड के कंधों पर । सन 1972 में गठित की गई यह कमांड जंगलों , पहाड़ों , ग्लेशियर पर हमारी शरहद की हिफाजत कर रही है ।

इस कमांड के जवान हमेशा पारंपरिक युद्ध और गैर पारंपरिक संघर्ष के लिए तैयार रहते हैं । नॉर्दर्न कमांड के तीन ऑपरेशनल कोर 16 कोर जिसका मुख्यालय जम्मू के नगरोटा में है । 15 कोर का मुख्यालय श्रीनगर में है और वह कश्मीर घाटी में दशहथ गर्दू से लड़ती है । 14 कोर का मुख्यालय लद्दाख के लेह में है और उसका सामना पाकिस्तान और चीन की सेना से होता रहता है ।

नॉर्दर्न कमांड का एक ही नारा है किसी भी घुसपैठिए को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा । इनका एक ही तरीका है पहला रोकता है दूसरा निशाना लगाता है और तीसरा मार देता है । यहां पर घुसपैठियों को खत्म कर देते हैं । ताकि उस इलाके में कुछ दिनों तक शांति बनी रहे तथा कोई दूसरी घुसपैठ ना हो । यहां पर तैनात सैनिकों को सरहद पार से आने वाले घुसपैठियों से लगातार आमना सामना होता रहता है ।

स्पेशल फोर्स की टीम एक मशीन की तरह काम करती है । जिसका हर पुर्जा जा एक दूसरे के तालमेल में बिल्कुल सही ढंग से बैठता है । यह टीम एक बेहतरीन योजना बनाती है जो कि उस माहौल के हिसाब से सटीक होती है । ऐसे में रेडियो इस्तेमाल नहीं किया जाता है । हाथ के इशारे से संकेत दिए जाते हैं ।

देखो और मारो के यह मिशन इसलिए इतने कामयाब हो पाते हैं की टीम के हर सदस्य को अपनी भूमिका मालूम होती है । भारतीय सेना के नॉर्दर्न कमांड के सैनिकों को अनोखी चुनौतियों का सामना करने की ट्रेनिंग दी जाती है । घुसपैठियों से लड़ना साये में लड़ने के जैसा ही होता है ।

एलओसी पर भेजने के लिए सैनिकों को ट्रेनिंग कहां दी जाती है ?

एलओसी के बाद सैनिकों को भारत भेजने के लिए सबसे पहले इन कैंपों में ट्रेनिंग दी जाती है यह पूरी तरह से हथियारबंद और गोरिल्ला सेना है जिनका सिर्फ एक ही मकसद है आतंकवादियों को घुसपैठियों को उन्हीं की भाषा में जवाब देना सिखाया जाता है ।

किसी भी घुसपैठ को रोकने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होती है सतर्कता । हमारे पास जो भी वैज्ञानिक और तकनीकी उपकरण है । हमें जो भी खुफिया जानकारी मिलती है या फिर हमारे पास जो टेक्नोलॉजीकल डिवाइस है वह सिर्फ मदद कर सकते हैं । सच तो यह है कि एक चौकनी सैना बड़ी ही आसानी से घुसपैठ की कोशिशों को रोक सकती है ।

इन्ह यह सीखना पड़ता है कि सरहद पर या फिर दुश्मन के गढ़ में रास्ते का पता कैसे लगाया जाता है । इस ट्रेनिंग के बाद एक ऐसा जांबाज फौजी तैयार होता है जो दुश्मनों के लिए तो बहरे होता है । लेकिन आम लोगों के लिए बेहद ही नरम दिल होता है ।

रणनीति और तरीके इस तरह से बनाए गए हैं कि इन इलाकों में काम करने पर कोई भी परेशानी ना हो । यहां पर गोलीबारी करना कोई आसान काम नहीं होता है । ट्रेनिंग में यह जवान बिल्कुल सटीक निशाना लगाना सीखते हैं और वह दाएं और बाएं दोनों हाथों से बिल्कुल सही निशाना लगाने में माहिर हो जाते हैं ।

एलओसी पर बाड़ लगाने का काम कब शुरू किया गया था ?

एलओसी के पास घुसपैठ को रोकने के लिए बाड़ लगाई गई थी । इस बाड़ को लगाने का काम 2004 में पूरा हुआ । यह है बाड़ लाइन ऑफ कंट्रोल पर 600 किलोमीटर दूर तक लगाई गई है । यह बाड़ असली लाइन ऑफ कंट्रोल पर नहीं लगी हुई है । बल्कि यह भारतीय इलाके के अंदर है ।

यहां पर दिन-रात चौकसी रखनी पड़ती है और उसके लिए चाहिए होती है चौकानी निगाहें । यदि हम आतंकवादियों की पहचान करके उन्हें नहीं रोका गया तो वह हमारी सीमा के अंदर आकर तबाही मचा सकते हैं ।

पूरी बाड़ की अच्छी तरह से निगरानी रहे इसके लिए बाड़ के आसपास पूरी रात चौकसी की जाती है या फिर गश्त लगाई जाती है । गश्त लगाने वाला सैनिक इस इलाके में होने वाली छोटी मोटी मुठभेड़ के लिए हमेशा तैयार रहता है । गश्त लगाने वाली टोली के सदस्य लगातार एक दूसरे के संपर्क में रहते हैं ।

एक दूसरे को उस इलाके की ताजा खबर देते रहते हैं । जहां पर गस्त लगाते हैं वह सारी जानकारी टोली के लीडर को दे दी जाती है और वह अलग-अलग जगह की गस्त का काम अलग अलग जवानों को सोंपता है । अगल बगल की टोली के लीडर एक निश्चित जगह पर मिलते हैं । वह एक दूसरे को पूरी जानकारी देते हैं ।

निगरानी के इस मुश्किल काम में जानकारी लेना देना बहुत ही अहम काम होता है । सतर्क गस्ती दल अपने इलाके की जानकारी सर्विलेंस रूम को भेजता है । वह जानकारी की अलग-अलग इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से जांच पड़ताल करके उसकी पुष्टि की जाती है । सर्विलेंस रूम का जानकार हर जगह से आने वाली जानकारी को मिला करके देखता है ।

एलओसी पर जानकारी का विश्लेषण किस तरह से किया जाता है ?

फिर वह जानकारी एक मोबाइल सर्विलंस को भेज दी जाती है । उसके बाद वह जानकारी एक और सर्विलेंस को भेज दी जाती है । फिर तमाम जानकारियों को एक साथ रख करके उनका विश्लेषण किया जाता है । जब हालात बिल्कुल साफ हो जाते हैं तब उन इलाकों के कमांडरों को हालात के मुताबिक काम करने के निर्देश दिए जाते हैं ।

भारतीय सेना सिर्फ जमीन से जमीन पर लड़ने वाली सेना नहीं है । सेना के जवान चीता हेलीकॉप्टर उड़ाते हैं जो खासतौर से भारतीय सेना के लिए बनाया गया है । जमीन पर तो निगरानी की सीमाएं होती है पर आसमान से सब कुछ साफ साफ नजर आता है ।

सीमा पर लगी हुई बाड़ एलओसी से करीब 700 मीटर अंदर है । इसके अलावा कई जगह पर तो यह 5 किलोमीटर तक अंदर है । इसलिए भारतीय सेना के जवानों को एलओसी के पार भी जाना पड़ता है और वहां पर गस्त लगानी पड़ती है । ताकि घुसपैठ के पुराने तथा नए रास्तों का पता चल सके ।

भारतीय सेना के फौजी बाड़ के आगे तथा लाइन ऑफ कंट्रोल के पीछे तक गस्त लगाते रहते हैं । जब इनकी ड्यूटी खत्म हो जाती है तब यह बाड़ को सुरक्षित तरीके से पार करते हैं । इसके लिए बाड़ में ही कई जगह पर दरवाजे बनाए गए हैं । जिन्हें हाथों से खोला जा सकता है ।

एलओसी पर बाड़ लगाने के लिए किस तरह के तारों का प्रयोग किया गया है ?

स्टील के धारदार कटीले तारों को नॉर्मल तारों की तरह आसन से नहीं काटा जा सकता है । अगर यह मुड जाते हैं तो उन्हें सीधा किया जा सकता है और इनकी देखभाल भी नहीं करनी पड़ती है । बाड़ से बिजली की करंट भी गुजरती रहती है । जो कि मोशन सेंसर , थर्मल इमेजिंग डिवाइस , लाइटिंग सिस्टम और अलार्म के नेटवर्क से भी जुड़ी हुई होती है ।

नॉर्दन सेंटर में एलओसी जंगलों , पहाड़ों और घाटी से होकर गुजरती है । इस इलाके पर अपना दबदबा बनाना और मौसम से लड़ना बड़ा ही चुनौती भरा काम है । एआईओएस एक बड़ा ही जबरदस्त अवरोध है । यह आतंकवादियों को हमारी सीमा के अंदर आने से रोकता है ।

पूरी एलओसी पर कुछ जवान तो दुश्मनों पर खुले में ही नजर रखते हैं । कुछ जवान बंकरो के अंदर छिपे रहते हैं । वहां पर वह बिल्कुल अकेले होते हैं । दुनिया से कटे रहते हैं और इरादा बस एक ही होता है । दुश्मन पर नजर रखना ।

यहां ड्युटी बदलती रहती है । इसलिए बंकर से जाने वाला संतरी बनकर में आने वाले संतरी को पूरी जानकारी दे देता है । सेना रोजाना की घटनाओं का पूरा ब्यौरा रखती है । पूरी घटना का विस्तृत विवरण लिखा जाता है । यदि कभी जरूरत पड़े तो जानकारी को फिर से जांचा जा सकता है ।

सरहद पर तैनात जवान हमेशा ड्यूटी पर ही होता है । जब भी अलार्म की घंटी बजे उसे लड़ने के लिए तैयार हो जाना चाहिए । निगरानी का काम दिन-रात चलता रहता है और निगरानी करने वाले जवानों को दो पल का भी आराम नहीं मिलता है । रात होते ही भारतीय जवान पूरी तरह से चौकन्ना हो जाते हैं ।

घुसपैठियों तथा दुश्मन को सबसे ज्यादा फायदा कब होता है ?

रोशनी कम होने की वजह से घुसपैठियों को फायदा मिलता है । यहां पर तैनात जवानों की इंद्रियां बड़ी ही सजक होनी चाहिए । ताकि वह हल्की से हल्की आवाज और अनजाना आकृतियों की पहचान कर सकें ।

जहां पर इंसान की इंद्रियां काम नहीं करती वहां पर आला दर्ज के आधुनिक उपकरण तथा ट्रेंड कुत्तों का इस्तेमाल किया जाता है । जब दुनिया सोती है तब यह फौजी जागते हैं और हमारी हिफाजत करते हैं ।

जमीन पर एलओसी का कोई निशान नहीं है । इसलिए यहां पर तैनात जवान आमतौर पर कुदरती निशानों से अपनी सीमा की पहचान करते हैं । जवानों को इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि वह गलती से भी एलओसी पार ना करें । एक गलती भी जानलेवा हो सकती है । एलओसी पर नदियां भी एक बहुत बड़ी मुसीबत होती है ।

भारत और पाकिस्तान दोनों की सरहद पर बहने वाली नदी कुछ साल में या फिर मॉनसून के दौरान अपना रास्ता बदलती रहती है । ऐसे वक्त पर नदी किनारे की रखवाली के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है । दोनों सेनाओं की बीच छुटपुट मुठभेड़ होना आम बात है ।

जमीन पर तैनात सेना को अक्सर बड़े हथियारों की जरूरत पड़ती है । तोपों को सबसे पहले तो सही जगह पर लाया जाता है और फिर इन तोपों के पुर्जों को सही ढंग से जोड़ा जाता है । जिसका रिहरसल पहले से ही कर लिया जाता है । यहां पर रफ्तार बेहद अहम होती है ।

2003 के बाद भारत और पाकिस्तान के के बीच युद्ध विराम संधि होने के बाद एलओसी के दोनों तरफ सेना के जवान के कमांडर तोपों की तैनाती का आदेश दे सकता है ।

एलओसी भारत के किस राज्य से गुजरती है ?

लाइन ऑफ कंट्रोल भारत के लद्दाख क्षेत्र से हिमालय की तलहटी से गुजरती है । लद्दाख का ज्यादातर हिस्सा बंजर है और यहां पर आबादी भी बहुत कम है । पहले एक ऐसा अनौपचारिक समझौता था कि सर्दियों के मौसम में दोनों देशों की सेनाएं इन ऊंची चोटियों से हटा ली जाएं ।

लेकिन 1999 के बाद सब कुछ बदल गया । उस साल पाकिस्तानी सेना ने भारतीय चौकियों पर कब्जा कर लिया था । क्योंकि वहां पर हमारे जवान नहीं थे । भारतीय सेना ने कई महीनों के बाद कारगिल युद्ध जीतकर के उन चौकियों पर फिर से कब्जा जमाया । उसके बाद इन चौकियों पर साल भर जवान तैनात रहते हैं ।

इन खतरनाक हालात में जोखिम भी बहुत ज्यादा होते हैं । बर्फ से ढके इस इलाके में शरहद की सुरक्षा करना कोई आसान काम नहीं है । दुश्मन भी यहां पर ज्यादा दूर नहीं है और उसे रोकना के लिए कोई बाड़ भी नहीं है । फोर्टीन कोर के जवान इस बात का ध्यान रखते हैं दुश्मन एलोसी को पार ना कर पाए ।

इस इलाके की जान है नेशनल हाईवे । जो कि श्रीनगर से लेह के बीच 434 किलोमीटर की दूरी तय करता है । लेह पूर्वी लद्दाख और दुनिया के सबसे ऊंचे जंग के मैदान है । सियाचिन तब खाने-पीने और दूसरी चीजों को पहुंचाने का यही इकलौता रास्ता है । सन 1999 में इस सड़क पर भी हमला किया गया था । दुश्मन यह जानता था कि यह सड़क ही इस इलाके की जान है ।

सेना के काफिले अक्सर यहां पर नजर आते हैं । इन जगहों पर खाने पीने का सामान और गोला बारूद और सर्दियों में जवानों को बचाए रखने वाली सबसे जरूरी चीजें और इंधन लाया जाता है । ज्यादातर सामान गर्मियों के मौसम में ही पहुंचाया जाता है ।

कहीं ऐसी जगह है जहां पर सड़के नहीं है तथा ट्रक वहां तक नहीं जा सकते हैं । इन जगहों पर पहाड़ों के चारों और खतरनाक चोटियों को पार करके ही पहुंचा जा सकता है । लेकिन यह काम बहुत ही खतरनाक होता है ।

भारत-पाकिस्तान युद्ध कब हुआ ?

ऐसे में काम आते हैं लद्दाख के खच्चर । जो की बड़े ही काम के साबित होते हैं। यह सेना की ऊंची चौकियों तक रसद पहुंचाते हैं । खच्चर के काफिले का इस्तेमाल 1947 के भारत-पाक के युद्ध के बाद से ही किया जा रहा है ।

यह जवानों का हौसला बढ़ाने वाली एक और चीज लाते हैं । यह जवानों की चिट्टियां भी लाते हैं जिनका इन्हें बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है । पहाड़ की ऊंचाई ऊपर लड़ने के लिए एक खास किस्म की ट्रेनिंग की भी जरूरत होती है । जवानों को अनिश्चित अनजान बिहड़ो में लड़ना पड़ता है । यहां पर मौसम का मिजाज की बदलता रहता है ।

जरूरी फिजिकल के साथ-साथ दिमागी तौर से भी मजबूत होना जरूरी होता है । इन जवानों को यहां पर भेजने से पहले इन्हें खास ट्रेनिंग दी जाती है । इस ट्रेनिंग का एक ही मकसद होता है जवान पर यहां की भौगोलिक स्थिति हावी ना हो । यहां पर उपस्थित नदियां और गहरी खाई या आम बात है जिन्हें सिपाहियों को पार करना पड़ता है ।

यहां की तेज नदियों को वोट से पार करना बहुत ही खतरनाक होता है । इसे रस्सी से पार किया जाता है । ट्रेनिंग के बाद इनके मन से सारा डर निकल जाता है । इस तरह की ट्रेनिंग से जवानों का हुनर बेहतर होता है और सेना को ऐसे जवान भी जाते हैं जो कि स्पेशल ऑपरेशन में या फिर गैर पारंपरिक युद्ध मैं लड़ सके ।

नेशनल हाईवे सेना की जरूरत को पूरा करता है और इसकी देखरेख भी सेना के जवान ही करते हैं । मौसम की वजह से और एवलांच की वजह से यह सड़क ज्यादा भरोसेमंद नहीं है । साल के 6 महीने सर्दियों के मौसम में यह सड़क बंद रहती है । बारिश से मुसीबतें और बढ़ जाती है सेना के पास सिर्फ गर्मियों का मौसम ही होता है जो कि साल भर के लिए अपने जवानों तक रसद पहुंचा सके ।

कारगिल का युद्ध कब हुआ ?

यहां का तापमान -60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचाता है । ऑक्सीजन का स्तर भी बहुत कम हो जाता है । जगहों पर हालात वैसे ही होते हैं जैसे उत्तरी या फिर दक्षिणी ध्रुव पर होते हैं । हत्यारों को भी हिफाजत चाहिए होती है । सरहद की इस तरह की चौकसी शायद ही दुनिया की कोई दूसरी सेना करती है । यह जगह बेहद ही खूबसूरत है पर खतरनाक भी कम नहीं है । 1999 में यह बिहड़ इलाका था जोकि कई महीनों तक जंग का मैदान बना रहा ।

कारगिल ऑपरेशन में दुश्मन को सबसे बड़ा फायदा इस बात का हुआ कि वह सबसे अधिक ऊंचाई पर था और नीचे की हर गतिविधि पर उसकी नजर थी । एलओसी की रखवाली आज भी आसान नहीं है । लड़ाईया होती रहती है और दुश्मन की हरकतों का अंदाजा लगाना मुश्किल है । यह इलाका बड़ा ही खतरनाक है । मगर भारतीय सेना इस लाइन ऑफ कंट्रोल की रक्षा करती है । सच्ची लगन से सीना तान कर के ।