ग्लेशियर विवाद का इतिहास | History of Siachen Glacier in Hindi सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर कौन सा है?

सियाचिन ग्लेशियर के बारे में रोचक जानकारी सियाचिन से जुड़े भारतीय सेना के तथ्य

भारतीय सेना के तथ्य जानें सियाचिन ग्लेशियर विवाद क्या है?

ग्लेशियर विवाद का इतिहास | History of Siachen Glacier in Hindi सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर कौन सा है?

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लद्दाख यह बंजर इलाका प्राचीन सिल्क रूट पर महत्वपूर्ण मुकाम हुआ करता था । कार्मा इसी रास्ते से सुदूर पूर्व भारत , यूरोप के बीच मसाले , रेशम , सोना और चांदी लाया और ले जाया करते थे । इस रूट के इर्द-गिर्द बौद्ध धर्म फला फूला । भारत से चीन और सेंट्रल एशिया तक फैल गया ।

लेकिन बीसवीं सदी के मध्य से भारत , पाकिस्तान और चीन के लिए लद्दाख की अहमियत पूरी तरह से बदल गई । इन तीनों देशों की सीमाएं काराकोरम पहाड़ों से लगी हुई है । इसके पूर्व में चीन और पश्चिम में पाकिस्तान है । यह दोनों ही देश भारत के साथ युद्ध लड़ चुके हैं ।

ग्लेशियर से भरे इस इलाके में लेह से करीब 200 किलोमीटर उत्तर में मौजूद है सियाचिन ग्लेशियर । जो कि 77 किलोमीटर लंबा है । जिस का निचला छोर 12000 फीट की ऊंचाई पर है और सबसे ऊपरी छोर 18000 किलोमीटर से भी ऊपर की ऊंचाई पर स्थित है ।

सियाचिन पर पिछले 3 दशकों से भी लंबे दौर से जंग छिड़ी हुई है । यह इलाका दुनिया का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र है । सियाचिन दूसरा सबसे लंबा ग्लेशियर है । सियाचिन के पश्चिम में साल्तोरो रिज है । इसके उत्तर में इंदिरा कोल जो भारत का सबसे उत्तरी छोर है । इसके आगे और पश्चिम में मौजूद है कश्मीर का वह इलाका ( पीओके ) पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर ।

सियाचिन के पूर्व में है काराकोरम पास । भारतीय सेना सियाचिन ग्लेशियर और saltoro रीज पर तैनात है । जो 20000 से भी ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है ।

भारतीय सेना का फोर्टीन कोर हेड क्वार्टर लेह में मौजूद है । सियाचिन पहुंचने से पहले भारतीय सैनिक सबसे पहले इसी कैंप में पहुंचते हैं ।

ग्लेशियर पर मौजूद जवानों कि ज्यादातर जान का खतरा कम ऑक्सीजन तथा खराब मौसम की वजह से पैदा होता है ।

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में बने इस चीता हेलीकॉप्टर में कुछ ऐसे बदलाव किए गए हैं । जिससे कि इसे इतनी ऊंचाई पर उड़ाया जा सके । इनमें बदलाव की वजह से 1950 किलो कैपेसिटी से करीब करीब 2 गुना वजन उठा लेता है ।

इतनी ऊंचाई पर हेलीकॉप्टर को उड़ाने के लिए मौसम का हवा के बदलाव का तथा बारिश का भी सामना करना पड़ता है । इसके अलावा उन्हें अतिरिक्त ऑक्सीजन भी चाहिए होती है । कुदरत का मुकाबला करते हुए यह साउथ और रिच की तरफ बढ़ते हैं । क्योंकि सियाचिन ग्लेशियर की बगल में है ।

यहां खराब मौसम में हवा की रफ्तार 200 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार हो सकती है । यहां पर लैंडिंग के विकल्प भी सीमित होते हैं । सियाचिन में हेलीकॉप्टर हर 7 मिनट में टेक ऑफ करते रहते हैं ।

लद्दाख के काराकोरम पहाड़ों में ट्रेनिंग भी चलती रहती है जो कि सियाचिन ग्लेशियर के लिए तैयार होती है । यह सैनिक दुनिया की सबसे ऊंची रणभूमि की तैयारी करते हुए ऊंची ढलान ऊपर चढ़ाई करते हैं ।

सियाचिन तथा बेसकैंप करीब 200 किलोमीटर का होता है । सेना का पहला पड़ाव खारतुंगला है । खारतुंगला की ऊंचाई 17000 फिर से भी ज्यादा है और यह दुनिया की सबसे ऊंची सड़क है । खारतुंगला लेह के 40 किलोमीटर उत्तर में है ।

भारत और पाकिस्तान की सीमा से पहले एक तुरतुक गांव बसा हुआ है जो की आखिरी भारतीय गांव में से एक है ।

सीमा का विवाद सन 1947 में ब्रिटिश राज के भारत के बंटवारे के समय से ही चल रहा है । पाकिस्तान को यह बंटवारा मंजूर नहीं था । क्योंकि कश्मीर अभी भारत के पास था ।

अक्टूबर 1947 में पाकिस्तानी सेना ने भारत पर हमला किया सन 1949 में युद्ध विराम की घोषणा की गई और कश्मीर के बड़े हिस्से पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया । सन 1972 में शिमला समझौते के तहत एलओसी यानी कि लाइन ऑफ कंट्रोल बनाई गई ।

यह रेखा दोनों देशों के नियंत्रण वाले इलाके को नियंत्रित करती है इसके बावजूद भी सीमाओं का मुद्दा पूरी तरह से सुलझा नहीं । एलओसी की मार्किंग ज्योग्राफिकल पॉइंट NJ9842 तक हुआ ।

भारत का कहना है कि एलओसी NJ9842 से उत्तर साल्टोरो रिज के साथ-साथ इंदिरा कॉल तक और फिर काराकोरम पास के पूर्व से चीन की सीमा तक जाती है

लेकिन पाकिस्तान का कहना है कि एलओसी NJ9842 से एक सीधी रेखा में काराकोरम पास से होते हुए चीन की लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल तक जाती है ।

इस प्रकार भारत और पाकिस्तान दोनों ही सियाचिन पर अपना दावा जताते हैं । ग्लेशियर के ऊपर मौजूद साल्टोरो रिज एक कुदरती सीमा बनी हुई है । इसी पर से भारतीय सैनिक सीमा पर नियंत्रण बनाए रखते हैं ।

काराकोरम पहाड़ों की गोद में सियाचिन ग्लेशियर में सेना की बटालियन ट्रेनिंग में जुटी हुई है जो कि सियाचिन ग्लेशियर की ताकत को कई गुना बढ़ा देती है । जो कि बर्फ से ढकी हुई चोटियों पर गोलाबारी करती है ।

यहां पर हवा की रफ्तार काफी तेज होती है तथा हर वक़्त बदलती ही रहती है । गोलाबारी की वजह से यहां पर एवंलांच भी आते हैं ।

बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में कई ब्रिटिश तथा अमेरिकी खोजी सियाचिन ग्लेशियर वाले इलाके में गए थे । इसका नाम शुरुआत में उगने वाले जंगली सिया रोजस के नाम पर पड़ा । पर इस बात को भुला दिया गया । दशकों बाद यह दुनिया की सबसे ऊंची रणभूमि बन गई ।

सन 1970 के आखिरी सालों में पाकिस्तान ने सियाचिन इलाके में मॉनिटरिंग को बढ़ावा देना शुरू कर दिया । ताकि इस हिस्से पर अपना दावा साबित कर सके । लेकिन भारत ने बिना वक्त गवाई प्रतिक्रिया की । जून 1978 में एक जाने-माने माउंटेनीयर कर्नल नरेंद्र कुमार के नेतृत्व में पहला भारतीय दल सियाचिन ग्लेशियर का सर्वे करने गया ।

यह एक सीक्रेट मिशन था । इसकी जानकारी किसी को नहीं थी । इस अभियान के लिए सैनिकों का चुनाव लद्दाख से किया गया था । जो कि इस इलाके से तो वाकिब थे । लेकिन उनके पास आधुनिक उपकरण नहीं थे । उन्हें हर कदम पर चुनौतियां झेलनी पड़ी ।

लेकिन बाधाओं का सामना करते हुए कर्नल कुमार तथा उनके साथियों ने 18900 फीट ऊंचे इंदिरा कोल और सियाचिन सेक्टर में मौजूद 24370 फीट ऊंची सिया कांगड़ी की चोटियों पर विजय पाई । यह चोटी भारत की सबसे ऊंची तथा दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची चोटी कंचन जंघा से सिरप 4000 फुट कम है ।

भारतीय सेना की टीम बहुत महत्वपूर्ण सूचना लेकर लौटी । इंटेलिजेंस रिपोर्ट के मुताबिक सन 1984 में पाकिस्तान ने यूरोप के स्थानीय सप्लायर को उन्हीं बहुत सारे आधुनिक उपकरण खरीदने का आर्डर दिया जिनका इस्तेमाल भारत करता था ।

इसका मतलब था कि पाकिस्तान की सेना ऊंचाई पर कदम जमाने की तैयारियां कर रही थी । इसे कूटनीति से नाम दिया गया ऑपरेशन आबप । इसके जवाब में भारत ने एक ऑपरेशन मेघदूत तैयार किया और सियाचिन में सैनिकों को आसमान से उतारा ।

इसकी शुरुआत 13 अप्रैल 1984 को हुई। कुछ ही समय के पश्चात भारतीय सेना पूरे सियाचिन इलाके पर अपना कब्जा जमा चुकी थी । इसके बाद गोलाबारी शुरू हुई और 19 साल तक चलती रही । पाकिस्तान ने 21000 फुट ऊंची पोस्ट पर कब्जा कर लिया था ।

इस महत्वपूर्ण चौकी पर भारत अब तक नियंत्रण नहीं कर पाया था । फिर 26 जून 1987 को भारतीय सेना ने अचानक हमला किया । दोपहर 1:30 बजे नायब सूबेदार बाना सिंह अपनी टीम के साथ 1500 फीट ऊंची बर्फीली दीवार पर चढ़े और उन्होंने कैद पोस्ट को अपने नियंत्रण में ले लिया । यह एक बहुत बड़ी जीत थी ।

कैप्टन बना सिंह को इस अभूतपूर्व शौर्य के लिए भारत के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से नवाजा गया । 19 साल चली भीषण गोलाबारी के बाद सन 2003 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम की घोषणा हुई ।

लेकिन ऑपरेशन मेघदूत के तहत भारतीय सैनिक अभी भी ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात हैं । ताकि सियाचिन पर देश का नियंत्रण बना रहे ।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक सन 1984 से अब तक भारत के करीब 900 सैनिक शहीद हो चुके हैं । सियाचिन वोर मेमोरियल उन भारतीय सैनिकों की याद में बनाया गया है । जिन्होंने सियाचिन वोर में अपनी जान कुर्बान की ।

सियाचिन बेस कैंप इस आखिरी छोर से 2 किलोमीटर दूर है । यहां पर तो जैसे एक पूरा शहर बसा हुआ है । यहां पर 10000 से भी ज्यादा सैनिक मौजूद रहते हैं । ताकि ग्लेशियर पर चलने वाले मिलिट्री ऑपरेशन में मदद दे सके । भारत को सियाचिन में मौजूद सैनिकों पर रोजाना 5 करोड़ खर्च करने पड़ते हैं । इसकी जिम्मेदारी बेस कमांडर हरी हरण पर है ।

हर साल करीब 6000 टन जरूरत की चीजें ग्लेशियर पर भेजी जाती है । इस सामान के बिना वहां पर जिंदा रहना नामुमकिन है । ऑपरेशन मेघदूत दुनिया में सबसे लंबे समय से चला आ रहा ऑपरेशन है जो की पूरी साल जारी रखना पड़ता है ।

एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर ध्रुव अकेला ऐसा हेलीकॉप्टर है जो कि सियाचिन की सबसे दूर मौजूद आर्मी पोस्ट पर भी लैंड कर सकता है । हिंदुस्तान एयरोनॉटिक लिमिटेड ने जो धुर्वे हेलीकॉप्टर बनाया है
उसमें एडवांस शक्ति इंजन है ।

यह 5500 किलो वजन उठा सकता है । यानी कि चीता हेलीकॉप्टर से ढाई गुना ज्यादा । अपनी कार्बन फाइबर बॉडी की वजह से इसका वजन बहुत कम होता है ।

इस ऊंचाई पर शरीर सुस्त पड़ने लगता है और दिमाग काम करना बंद कर देता है । यदि लगातार एक्सरसाइज करते हैं तो फेफड़े कम ऑक्सीजन के मुताबिक अपने आप को ढाल लेते हैं ।

8000 फीट की ऊंचाई पर मनुष्य को सांस लेने में दिक्कत हो सकती है । 12000 फीट की ऊंचाई पर सांस फूलने , नींद ना आने की शिकायत होने लगती है

17000 फीट की ऊंचाई पर हालात और भी ज्यादा खराब हो सकते हैं । शरीर का तापमान खतरनाक ढंग से घट सकता है और फेफड़ों में फ्लोएड भर सकता है 20000 फीट की ऊंचाई पर मौत का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है । जवानों को स्ट्रोक या फिर हार्ट अटैक हो सकता है ।

यहां के शुरुआती लक्षणों में हैं याददाश्त का कम हो जाना । हाई ट्रेनिंग की बदौलत ही यहां पर हर सैनिक टिक पाता है और सियाचिन पर देश की सुरक्षा कर पाएगा ।

सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा आर्मी ट्रेनिंग सेंटर है इतनी ऊंचाई पर दुनिया का कोई भी आर्मी ट्रेनिंग सेंटर नहीं है । ग्लेशियर पर मौजूद सैनिक को दी जाने वाली पोशाक की कीमत ₹55000 से भी अधिक होती है ।

हर सुबह बेस कमांडर यहां पर केरोसिन की जांच करते हैं । क्योंकि यहां पर सर्दियां बहुत लंबी होती है और हर दिन 35 फुट तक बर्फ गिरती है । तापमान शून्य से -60 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे तक पहुंच जाता है ।

इन मुश्किल इलाकों तक इंधन गर्मियों में ही पहुंचाया जाता है ‌ ग्लेशियर तक कोई सड़क नहीं है । लैंडिंग जगह भी नहीं है । इसीलिए दूर तक मौजूद चौकियों पर ज्यादातर सामान एयरड्राप किया जाता है ।

भारी सामान को me17 हेलीकॉप्टर से लाया जाता है जो कि जापान में बना है । इसके पीछे की तरफ एक दरवाजा होता है । जिससे सामान को लोड किया जाता है । सामान को गिराए जाने के बाद में तुरंत इकट्ठा करना होता है । वरना वह बर्फ में गुम हो सकता है ।

ME17 , धुर्वे के मुकाबले अधिक शक्तिशाली है । यह 13000 किलो तक सामान ले जा सकता है । यहां पर ओपी बाबा का मंदिर है जो कि सियाचिन वोर में शहीद हो चुके हैं । परंपरा के मुताबिक हर फोजी यां पर आने और जाने से पहले यहां पर आते है । कहा जाता है कि इस शहीद की आत्मा ड्यूटी पर जाने वाले हर सैनिक की रक्षा करती है ।

बहुत ज्यादा ऊंचाई पर डाइजेस्टिव सिस्टम धीमा हो जाता है । यह सैनिक यह भी जानते हैं की इनमें से कुछ सैनिक शायद ही कभी वापस लौटेंगे ।