धोलावीरा सभ्यता से जुड़ी महत्‍वपूर्ण जानकारी और रोचक तथ्‍य

धोलावीरा प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता का जीता जागता उदाहरण

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धोलावीरा प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता का हिस्सा रहा है ।धोलावीरा अपने अंदर 1500 वर्षों का इतिहास समाए हुए हैं । धोलावीरा में जल प्रबंधन तथा सड़क व्यवस्था पर काफी जोर दिया गया था । आज हम इसके बारे में विस्तार से जानेंगे ।

धोलावीरा गुजरात राज्य के कच्छ जिले के 1 गांव में है । धोलावीरा के आसपास तथा चारों और के खेतों में नमक भरा हुआ है । लगभग 10000 साल पूर्व में हुई विवर्तनिक गतिविधियों के कारण समुद्र के पीछे हटने के कारण यह अस्तित्व में आए होंगे ।

यह जगह भारत के सबसे बड़े अंतर दिपिय देशों में से एक है । भु वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि यहां पर विभिन्न पर्यावरणीय गतिविधियां रही है । अध्ययन से पता चला है कि रण करीब 3000 सालों तक 10 मीटर गहरे पानी के अंदर रहा होगा ।

अतीत में यह सत्र एक उथले समुद्र में एक दीप के रूप में उपयोगी रहा होगा । अभी तक यह पता नहीं चला कि लोगों ने इसे मुख्य भूमि के बदले रहने के लिए क्यों चुना । क्योंकि तुलनात्मक रूप से खेती सहित अन्य संसाधनों की उपलब्धता अधिक थी ।

कभी कबार यह भी अनुमान लगाया जाता है कि धोलावीरा एक सक्रिय बंदरगाह रहा होगा । यह अन्य खाड़ी देशों के साथ सुरक्षित रूप से व्यापार करने के लिए एक बंदरगाह रहा होगा ।

यह क्षेत्र हड़प्पा घाटी सभ्यता का हिस्सा रहा है । इसे सिंधु घाटी सभ्यता के रूप में भी जाना जाता है ।
इसके समकालीन सभ्यता मे मिसर तथा मेसोपोटामिया के की सभ्यताएं थी ।

इन सभ्यता वासियों के आपस में अच्छे व्यापारिक संबंध थे । सिंधु घाटी , मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा सभ्यता शहरों के सुनियोजित निर्माण के लिए प्रसिद्ध थी । मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा कालीन अधिकार क्षेत्र अब पाकिस्तान का हिस्सा है ।

स्वतंत्रता के बाद भारत ने सैकड़ों हड़प्पा स्थलों की खुदाई की । जैसे कि हरियाणा में राखीगढ़ी, प्राचीन बंदरगाह शहर लोथल तथा धोलावीरा ।

1967 में भारत में धोलावीरा की खोज तब हुई थी जब सिंधु से कच्छ तक हड़प्पा के भूमि मार्ग को खोजने की कोशिश की जा रही थी । लेकिन यहां पर उत्खनन 1990 में शुरू किया गया था ।

धोलावीरा कि प्रत्येक परत अपने में अनेक राज छुपाए हुए थी । इस खुदाई से हुए महत्वपूर्ण तथ्यों से दुनिया को अवगत कराया गया था । 1000 अधिक सालों तक दफन रहा यह शेहर दुनिया में पाए जाने वाले सबसे अच्छे संक्षिप्त शेहरों में से एक था ।

धोलावीरा भारतीय उपमहाद्वीप की सिंधु घाटी सभ्यता के बड़े शहरों मैं से एक है । पांच शहर पाकिस्तान में है तथा 2 शहर भारत में हैं । जिनमें से मोहनजोदड़ो शेहर को सबसे उत्कृष्ट माना जाता है ।

धोलावीरा शहर की बात की जाए तो इसमें हड़प्पा सभ्यता में नए आयाम स्थापित किए हैं । इस शहर से हमें हड़प्पा सभ्यता के उदय तथा पतन का प्रमाणित इतिहास मिलता है । जो कि लगभग 1500 वर्ष की अवधि का है ।

जब हम धोलावीरा शेहर में प्रवेश करते हैं , तब इसके जलाशयों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते हैं । इससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि धोलावीरा अपने समय में जीवित तथा सुंदर से रहा होगा । हड़प्पा वासियों ने संभावित नीति परिदृश्य को देखते हुए धोलावीरा के लिए इस स्थान को चुना होगा ।

इसके अलावा समुद्री व्यापार तथा इसके पर्यावरण पर भी विचार किया होगा । यह दीप कम वर्षा वाला है । इसीलिए किसी भी सभ्यता को विकसित होने के लिए पानी की आवश्यकता होती है ।

यह एक बहू विभाजित शहर है । जिसमें तीन मुख्य विभाजन है ।
1 दुर्ग
2 मध्य शहर
3 निचला शहर

यह एकमात्र ऐसा शहर है जिसमें हम हड़प्पा सभ्यता के भाग को पहचान सकते हैं । इसका दूसरा पहलू है पानी के जलाशयों की व्यापक श्रंखला। शेहर के उत्तरी पश्चिमी , दक्षिण पश्चिम भाग में यह व्यवस्था देखने को मिलती है ।

धोलावीरा का पूरा का पूरा शहर 1 चारदीवारी से गिरा हुआ था । सुरक्षा के लिए एक चार दिवारी बनाई गई थी ।

केई शेहर सिंधु घाटी सभ्यता से हजारों किलोमीटर दूर थे । धोलावीरा शेर को सुनियोजित तरीके से बसाया गया था । इसके अंदर पत्थरों पर तरासी मूर्तियां भी मिली है । इन शेहरों में शहरों के नियोजन की समानता भी पाई गई है । यानी कि सभी से सुनियोजित तरीके से बचाए गए हैं ।

धोलावीरा की सबसे शानदार खोज तो यह थी कि शहर के तीनों क्षेत्र अलग अलग तरीके से बसे हुए थे एक क्षेत्र दुर्ग का था । जहां पर सत्तारूढ़ राज परिवार तथा कुलीन लोग रहा करते थे । शहर के मध्य तथा निचले क्षेत्र में शेष की आबादी रहती थी ।

धोलावीरा में उत्तर से दक्षिणकी तरफ तथा पूरब से पश्चिम की तरफ की सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थी । सिंधु घाटी के कई अन्य शहरों की तरह यहां पर भी कस्बों का आकार एक समान त्रिभुज के जैसा था ।

धोलावीरा में गणितीय सिद्धांत तथा वास्तुकला के सिद्धांतों का उपयोग किया गया था । शहर के अंदर की बसावट को आश्चर्यजनक अनुपात तथा समानुपात के रूप में देखा जा सकता है

महल की बात करें तो महल की आंतरिक दीवारें 114 मीटर लंबी तथा 92 मीटर चौड़ी है जो कि एक समान अनुपात को बनाए रखती है । बाहर की दीवारों की माप है 151 मीटर तथा 118 मीटर है । जिनका अनुपात फिर से 5 :4 है ।

शहर के विभिन्न हिस्सों के अनुपात अलग-अलग है । उदाहरण के लिए दुर्ग की प्राचीर का अनुपात 1:1 है । मध्यम शेर की लंबाई तथा चौड़ाई का अनुपात 7:6 है । समारोह स्थल का अनुपात 6:1 है ।

इस अनुपात से हम गणित तथा वास्तुकला की अद्भुत तरीके को समझ सकते हैं । इसके अलावा शहर के मुख्य सड़क से लगने वाले सड़कों की चौड़ाई भी निश्चित थी । मुख्य सड़क 9 मीटर चौड़ी थी । अधिकतर घरों के बाहर की सड़कों की लंबाई डेड से 5 मीटर थी ।

धोलावीरा में प्रयुक्त निर्माण सामग्री ।

धोलावीरा में इमारतों को धूप में सुखी मिट्टी की ईंटों , पत्थर तथा लकड़ी से बनाया गया है । ईंटों को मापने से पता चलता है कि इसकी ऊंचाई तथा चौड़ाई और लंबाई के संदर्भ में 1: 2 : 4 के अनुपात को प्रदर्शित करती है ।

यहां पर ईंटों की कई इमारतों को पत्थर से ढका गया है । पुरातत्व वेदों ने उतरी गेट के कक्ष में लकड़ी के बोर्ड में हड़प्पा का अभिलेख पाया है । अपारदर्शी क्लास के टुकड़े से बना प्रत्येक शिलालेख या फिर चीन्ह की लंबाई 37 सेंटीमीटर और चौड़ाई 27 सेंटीमीटर है ।

हड़प्पा के शिलालेखों पड़ा तो नहीं जा सका है । लेकिन पुरातत्वविद का मानना है कि यह दरवाजे पर लगा साइन बोर्ड है । जिसमें इस बसावट के लिए एक निश्चित नामावली का उल्लेख था ।

धोलावीरा में दुर्ग की दीवारों में 17 द्वार मिले हैं । इसमें से सबसे विस्तृत दवार गढ़ के पूर्वी तथा पश्चिमी तथा उत्तर की ओर स्थित दीवारों में है । यहां पर पीले तथा झालर युक्त बलुआ पत्थर से निर्मित खंड तथा मूर्ति के जैसे निर्माण कार्य भी देखे गए हैं ।

धोलावीरा में एक मैदान है जो कि 47 मीटर चौड़ा और 283 मीटर लंबा है । इसका अनुपात 1:6 है । इसके अलावा यहां पर एक सिढीदार रचना भी है । जिसका उपयोग समारोह , खेल या फिर बाजार के रूप में होता होगा ।

वर्षा जल के भंडारण के लिए एक सूखी क्षेत्र में एक आसान सी तथा शानदार प्रणाली विकसित की । जीसे पानी के द्वारा हम जीवन को गति मिलती रहे । इससे वह बारिश के पानी पर कम निर्भर हो गए । उन्हें भूमि के जल से भी कोई विशेष उम्मीद नहीं थी । इसलिए उन्होंने चट्टानों को काटकर विशाल जलाशयों की एक जटिल जल प्रणाली का विकास किया होगा ।

उन्होंने 16 विशाल जलाशयों का निर्माण किया । जिसमें लगभग ढाई लाख घन मीटर पानी को भंडारित किया जा सकता था । इस मात्रा के आधार पर एक साधारण गणना से पता चलता है शहरी नियोजनकारो ने 15000 निवासियों के लिए प्रतिदिन 54 लीटर पानी के हिसाब से इस जलाशय का निर्माण किया होगा ।

हम यह भी जानते हैं कि कच्छ क्षेत्र आज एक रेगिस्तानी क्षेत्र है । यह एक निर्जन क्षेत्र भी है । जिसे चट्टानी रेगिस्तान भी कह सकते हैं । यहां पर बारिश हमेशा ही अनियमित रही है । इसलिए यहां पर अकाल आम है ।इसी कारण से हड़प्पा वासियों ने शहर में जल व्यवस्था की एक व्यापक व्यवस्था की ।

उन्होंने योजना को इस तरह से बनाया कि बारिश के पानी की एक भी बूंद बर्बाद ना हो । हर बूंद को सहेज कर के अपने जलाशयों में सरंक्षित करना चाहते थे । इन जलाशयों में से कुछ को ठोस चट्टानों को काटकर के बनाया गया है । कुछ जलाशयों में पानी तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनाई गई थी । ताकि लोग आसानी से पानी तक पहुंच सके ।

कहीं जलाशय के फर्श तथा कुंड में गड्ढे बनाए गए थे । जैसे कि सूखे वर्षों में भी उनमें पानी उपलब्ध रहे । धोलावीरा को उपरी तथा निचले शहरों में विभाजित किया गया था ।

ऊपरी शहर निचले शे र से 13 मीटर ऊपर था ।जिसके कारण उनके जलाशय बाद में भरते थे । दिलचस्प बात यह है कि रोमन वासियों के बहुत पहले हड़प्पा वासियों ने पानी को जलाशयों से शहर के मध्य से पहुंचाने के लिए प्राकृतिक ढलान का उपयोग करना सीख लिया था ।

इस काम के लिए कृत्रिम जल मार्गों यानी कि नालियों का निर्माण किया गया था । पानी की उपलब्धता से धोलावीरा के लोगों को पूरे वर्ष फसल उगाने की सुविधा मिली होगी । जिसका कारोबार यहां से 3500 किलोमीटर दूर स्थित मेसोपोटामिया तक समुद्र मार्गों के माध्यम से किया जाता था ।

धोलावीरा में एक विशाल बावड़ी भी खोजी गई है । यह 73.4 मीटर लंबी 29 मीटर चौड़ी 10 मीटर गहरी है। इसका आकार मोहनजोदड़ो के महान स्नानागार से 3 गुना बड़ा है । यह क्षेत्र में पाई जाने वाली दूसरी सबसे बड़ी जल संरचना है ।

शहर के अंदर कोई भी बाढ़ ना आए इसके लिए पानी के निकास के लिए एक अच्छी व्यवस्था थी । अतिरिक्त पानी जलाशयों में जा सके । धोलावीरा के घरों में भी अलग-अलग जल निकासी की व्यवस्था थी । जो कि सामान्यत एक सीवरेज टैंक में खाली होते थे ।

विडंबना यह है कि हजारों साल पहले हड़प्पा में ताजे पानी की हर एक बूंद को संग्रहित करने की व्यवस्था थी । जबकि वर्तमान में धोलावीरा में ऐसी कोई प्रणाली दिखाई नहीं देती है । धोलावीरा के अंदर एक और दिलचस्प स्थल मौजूद है ।

यहां पर एक विशाल वित्तीय संरचना मिली है जो कि कब्रिस्तान हो सकता है । अन्य हड़प्पा स्थलों के विपरीत जहां मृतकों के सिर उत्तर की तरफ है । यहां पर कब्र पूर्व दिशा में मिली है । जबकि कुछ कब्र उत्तर पूर्व दिशा में भी थी ।

हालांकि सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि सभी कब्र खाली है । हालांकि इसमें मूर्तियां , मोती तथा अन्य वस्तुएं भी मिली है । एक संभावना तो यह भी है कि यह एक कब्र ना हो करके केवल स्मारक है ।

यहां पर सात गोलार्ध भी मौजूद है । कुछ लोगों का मानना है कि यह कब्रिस्तान हो सकते हैं । जो कि सांची के बोध्द स्टुप की तरह लगते हैं । वास्तव में इन रचनाओं में से एक को पहिये के रूप में बनाया गया था ।

यहां पर मिट्टी के बर्तन , मिट्टी की मूर्तियां , जानवर तथा सोना , चांदी और सीपें शामिल है । इसके अलावा यहां पर खोजी गई चीजों में हड़प्पा के बेल गेंडों तथा अन्य जानवरों के चित्र प्रदर्शित है ।

यहां पर यह भी पता चला है कि शुरुआत में तांबा कैसे पिलाया जाता था । इसके अलावा यहां पर कुछ और उपकरण भी मिले थे । वहां पर मनका बनाने वाले उद्योग भी थे । यहां पर मूर्तियों , सिपों का व्यापक इस्तेमाल किया गया था ।

ईसा के अट्ठारह सौ वर्ष पूर्व एतिहासिक रिकॉर्ड से धोलावीरा गायब हो गया था । जिससे कि पता चलता है कि यह सभ्यता अंत की ओर थी । विशेषज्ञों का मानना है कि धोलावीरा का अस्तित्व का गगड़ नदी के पानी पर आधारित था । जिससे कि जलाशयों को भरा जाता था ।

एक शक्तिशाली भूकंप ने नदी के पानी को गंगा के बेसिन की तरफ झुका दिया होगा । जिससे धोलावीरा चित्र ऊंचा उठ कर के सुख गया होगा । विशाल जलाशयों में धीरे-धीरे मिट्टी भर गई । जिससे यह क्षेत्र उजड़ गया था । अट्ठारह सौ इस वर्ष पूर्व धोलावीरा 70 इतिहास से गायब हो गया था ।