हनुमान ने आठवीं सिद्धि 'वशिता सिद्धि' को कैसे प्राप्त किया

हनुमान ने आठवीं सिद्धि ‘वशिता सिद्धि’ को कैसे प्राप्त किया

सिद्धियों के विभिन्न प्रकार हनुमान सिद्धि लोक में माता लक्ष्मी के पास

हनुमान ने आठवीं सिद्धि ‘वशिता सिद्धि’ को कैसे प्राप्त किया सिद्धियों के विभिन्न प्रकार हनुमान सिद्धि लोक में माता लक्ष्मी के पास।hanumaan ne aathaveen siddhi vashita siddhi ko kaise praapt kiya एक समय की बात है ।

जब हनुमान सूर्य देव के पास शिक्षा ग्रहण करने गए थे । तब सूर्य देव की शिक्षा समाप्त होने के बाद सूर्य देव ने उन्हें अष्ट सिद्धियों के साधने के लिए सिद्धि लोक भेज दिया । हनुमान सिद्धि लोक में माता लक्ष्मी से मिले । माता लक्ष्मी ने उन्हें सिद्धि लोक के लिए भेज दिया ।

जैसे ही पवन पुत्र मारुती सिद्धि लोग के निकले । रास्ते में उन्हें एक बुढिया मिली । जो कि वशिता नामक सीधी थी । पर वह उस बुढिया का रूप धारण करे हुए थी ।

वह रास्ते में बैठी बैठी रो रही थी । तब हनुमान ने उनसे कारण पूछा कि तुम कीस वजह से रो रही हो । तब उस बुढिया ने कहा कि यहां का राजा बहुत ही धन दान करता है ।

जिससे कि यहां की प्रजा बिल्कुल भी परिश्रम नहीं करती है । यहां की प्रजा को मुफ्त का धन लेने की आदत पड़ गई है और वह बिल्कुल भी परिश्रम करके धन कमाना नहीं चाहते हैं ।

इस बात से अनुमान बहुत दुखी हुए और हनुमान ने बुढ़िया से पूछा कि तुम मुझे उस राजा से मिला सकते हो क्या ? तब बुढ़िया ने बताया कि कल सुबह हम राजा के दरबार में चलेंगे । जहां पर रोज राजा मदन सेन स्वर्ण का दान करता है ।

अगले दिन हनुमान और वह बुढ़िया राजा मदन सेन के दरबार में गए । जहां पर राजा रोजाना की तरह लाखों मुद्राएं दान करता था । वहां पर जाकर देखा तो सच में राजा स्वर्ण का दान करता है । जिससे कि उनकी प्रजा बिल्कुल ही परिश्रम नहीं करना चाहती है ।

उन्होंने खेती करना भी छोड़ दिया है । परिश्रम करना भी बिल्कुल ही छोड़ दिया है । वह राजा द्वारा प्राप्त किए गए धन से सुरा और सुंदरी में लगा देते हैं और पूरे दिन नशे में लिप्त रहते हैं ।

जब हनुमान ने राजा मदन सेन से वार्ता की तब मदन सेन ने कहा कि मैं तुम्हें भी स्वर्ण से तोल दूंगा । तब हनुमान ने भी इस शर्त को मंजूर कर लिया और हनुमान ने एक शर्त राजा मदन सेन से भी रखी ।

उन्होंने कहा कि यदि आप मुझे सोने से नहीं तोल सकते हो तो आप हमारा आजीवन दास रहोगे । हनुमान ने कहा कि यह शर्त आपको मंजूर है । तब राजा मदन सेन ने कहा कि हां यह शर्त मुझे मंजूर है कल मैं आपको सोने से तोल दूंगा ।

अगले दिन हनुमान और बुढ़िया फिर राज दरबार में उपस्थित हुए । राजा के सामने संपूर्ण धन वहां पर इकट्ठा कर रखा था । जैसे ही हनुमान पहुंचे राजा ने कहा कि मैं आपको सोने से तोलने के लिए तैयार हूं ।

हनुमान तराजू के एक तरफ बैठ गए तथा दूसरे पलड़े में सोना भरने लगे । सोना तराजू में रखते रखते संपूर्ण सोना का भंडार खत्म हो गया । राजा का राजकोष भी खत्म हो गया । लेकिन राजा हनुमान को सोने से नहीं तोल पाए ।

आखिरकार में राजा के पास से सारा सोना समाप्त हो चुका था । तब मारुति ने राजा को सुझाव दिया कि अभी भी आपके पास दान देने के लिए बहुत कुछ बचा है । तब राजा ने पूछा कि मेरे पास अभी भी क्या बचा है ।

तब मारुति ने बताया कि अभी भी आपका राजमुकुट और आप के आभूषण आप ने दान में नहीं दिए हैं । सच्चा दानी तो वही होता है जो राजमुकुट और अपने आभूषण दान करता है ।

मारुति के इतना कहने के बाद में राजा मदन सेन ने मुकुट और अपने आभूषण भी दान में दे दिए । लेकिन वह मारुति को सोने से नहीं तोल पाए । मारुति का पलड़ा अभी भी भारी ही था । तब राजा मदन सेन ने कहा कि मुझे आप 1 दिन का वक्त और दीजिए ।

मैं आपको कल सोने से अवश्य तोल दूंगा । राजा ने बताया कि मेरे पास धनदा दक्षिणी है । मैंने उसको साध रखा है जो कि मुझे प्रतिदिन लाखों स्वर्ण मुद्राएं देती है ।

उसी समय धनदा यक्षिणी वहीं पर प्रकट हो गई और उन्होंने बताया कि मैं अब आपकी कोई भी सहायता नहीं कर सकती । तब राजा मदन सेन ने कहा क्यों नहीं मेरी सहायता कर सकती । तब धनदा यक्षिणी ने बताया कि मैं अब आपकी दासी नहीं रही।

धनदा यक्षिणी ने राजा को बताया कि आपने मुझे इसी राज महल में साधा था । अब वह राजमहल आप दान में दे चुके हैं । वह आपका नहीं है और अब आप राजा भी नहीं रहे हैं । क्योंकि आपने सब कुछ मारुति को दान में दे दिया है । अब आप एक साधारण इंसान रहे हो ।

अब राजा बेबस तथा लाचार हो गया था । अब राजा के पास एक ही कार्य शेष बचा था । वह था हनुमान का दास बनना स्वीकार करना । अब हनुमान ने राजा को कह दिया कि आपके पास कुछ भी नहीं है , दान करने के लिए । तब राजा मदन सेन भी हनुमान के दास बनने के लिए तैयार हो गए ।

दास बनने के बाद हनुमान ने राजा मदन सेन को आदेश दिया कि जो मेरी माता है , जो की बुढ़िया के रूप में है । उसको परिश्रम की रोटी बहुत पसंद होती है । आप परिश्रम की रोटी लेकर आए ।

राजा पहले तो पूरे राज्य में गया । लेकिन उन्हें परिश्रम की कहीं भी रोटी नहीं मिली । वह राज्य में गया । वह सभी से कार्य भी मांगा कि मुझे परिश्रम से धन अर्जन करके माता को रोटी खिलानी है । लेकिन किसी ने भी उनकी कोई हेल्प नहीं की ।

क्योंकि राज्य में कोई भी श्रम या कार्य नहीं करता था क्योंकि राजा मदन सेन प्रतिदिन स्वर्ण मुद्राएं दान करता था । जिससे कि वहां की प्रजा ने कार्य करना भी बंद कर दिया था । वह हमेशा सुरा और सुंदरी में ही लिप्त रहते थे ।

उसके बाद राजा मदन सेन ने मारुति थे रिक्वेस्ट की थी कि मैं किस प्रकार से आपकी सेवा करूं । तब मारुति ने बताया कि आपको इस धरती पर हल चलाना होगा । तब राजा मदन सेन ने धरती पर हल चलाया और धरती को हरा-भरा किया तथा उसमें बीज भी बोए ।

उसके बाद में मारुति ने कहा कि माता इतने से ही प्रसन्न नहीं होगी । आपको और भी करना होगा । तब राजा मदन सेन ने कहा आदेश दीजिए । मुझे और क्या करना होगा ।

तब मारुति ने कहा कि जिस प्रकार आपको सद्बुद्धि आई है उसी प्रकार आपकी राज्य की प्रजा को भी सद्बुद्धि लानी है । तब राजा मदन सेन अपने राज्य की प्रजा के पास गए और श्रम करने के लिए कहा ।

जैसे ही राजा मदन सेन अपनी प्रजा के पास गए । प्रजा को श्रम के लिए बोला । राजा की समक्ष प्रजा विद्रोह के लिए उतर आई और राजा को ही मारने पीटने लगी ।

तभी मारुति ने उन्हें रोका और समझाया तब जाकर प्रजा को समझ में आया कि श्रम करनी चाहिए । उसके बाद में प्रजा भी श्रम में लग गई ।

सारे किसान खेत में जाकर हल चलाने लगे । जिससे धरती पर हरियाली छा गई । सभी जगह चारों और हरियाली ही हरियाली थी । इस प्रकार हनुमान ने वशिता सिद्धि को प्राप्त कर लिया । लेकिन हनुमान को इस बात का ज्ञान नहीं था कि उसने वशिता सिद्धि को प्राप्त कर लिया था ।