लोहा स्तंभ के बारे में रोचक जानकारी दिल्ली के लौह स्तम्भ में जंग क्यों नही लगता

कुतुब मीनार या लौह स्तम्भ लोहे स्तम्भ से जुड़ी 14 मज़ेदार जानकारियां और आंकड़े

लोहा स्तंभ के बारे में रोचक जानकारी दिल्ली के लौह स्तम्भ में जंग क्यों नही लगता

लौह स्तम्भ से जुडी रोचक जानकारियां | Interesting Facts About Iron Pillar of Delhi दिल्ली के लौह स्तम्भ में जंग क्यों नही लगता Iron Pillar in hindi लोहे से जुड़ी 14 मज़ेदार जानकारियां और आंकड़े

लोहे स्तंभ के पीछे एक बहुत बड़ी जानकारी छिपी हुई है । जिसे इतिहासकार काफी समय से खोजबीन कर रहे हैं । यह स्तंभ 90% काले लोहे से बना है और 16 वर्षों से अपनी जगह पर खड़ा हुआ है ।

14 ईसवी में बने इस स्तंभ को भगवान विष्णु को समर्पित किया गया है । इसे गुप्त वंश के राजा चंद्रगुप्त द्वितीय की स्मृति में बनवाया गया था । यह स्तंभ मूल रूप से मध्यप्रदेश में स्थापित था । यह स्तंभ को वर्तमान स्थान तक लाने तक का रहस्य अभी भी बरकरार है ।

दिल्ली का ये लौह स्तंभ दे रहा है वैज्ञानिकों को चुनौती

इस स्तंभ की ऊंचाई 7.2 मीटर है और यह भूमि में 93 सेंटीमीटर नीचे दबा हुआ है । इसका व्यास शिखर पर 29 सेंटीमीटर है जो कि बढ़ता हुआ आधार तक 42 सेंटीमीटर हो जाता है । इस स्तंभ में उपयोग की गई धातु शुद्ध लचीला लोहा है ।

1600 साल पहले इस तरह के विशाल स्तंभ बनाने की कला प्राचीन भारत के धात्विक विज्ञान की उत्कृष्टता का परिणाम है ।

यह स्तंभ जमीन से कुछ 100 सेंटीमीटर ऊपर तक खुरदरा है और आंखों के स्तर पर अत्यधिक चिकना है । इसके आधार की सतह अब खुरदरी हो गई है । इस स्तंभ का ऊपरी हिस्सा बहुत ज्यादा ही परिष्कृत है । जिसे कभी कबार गलती से तांबा समझ लिया जाता है ।

रेत या फेरिक ऑक्साइड के कारण तिरछे कोण से देखने पर इसका रंग तांबे के जैसा लगता है । स्तंभ को एक नजर में देखने पर यह धातुकर्मियों के कौशल का पता चल जाता है । उच्च गुणवत्ता के लोहे के साथ यह प्राचीन कला का सबसे बड़ा हाथों द्वारा बनाया गया लोहे का स्तंभ है ।

विशेषज्ञों का मानना है कि गैर यूरोपियन ने केवल भारतीय ही थे जो कि लोहे के ढलवा टुकड़ो का निर्माण करने में सक्षम थे ।

 दिल्ली के लौह स्तम्भ में जंग क्यों नही लगता है Iron Pillar in hindi

जब इसकी तुलना अन्य स्तंभ से करते हैं तो अन्य स्तंभ की तुलना में इसमें जंग बहुत कम लगा है ।जबकि वह केवल 700 वर्ष पुराने ही हैं ।

इसके पीछे दो मुख्य सिद्धांत है ।

पहला पर्यावरणीय कारक है ।
दूसरा अयस्क सामग्री है ।

दिल्ली की जलवायु काफी सुखी है । इसीलिए यहां पर लोहे का अधिक क्षरण नहीं होता है । यहां पर सापेक्षिक आद्रता 80% से कम होती है । यहां पर साल में 20 दिन ही 80% से अधिक आद्रता होती है । इसलिए दिल्ली के वातावरण में लोहे में जंग अधिक नहीं लगता है ।

जंग कम लगने की दूसरी अधिक रोचक धारणा यह है कि लोहे के गुण धर्मों से संबंधित है । इस स्तंभ में फास्फोरस सबसे अधिक मात्रा में है । यह मात्रा इस स्तंभ को विशेष बनाती है ।

लोहे स्तम्भ से जुड़ी मज़ेदार जानकारियां

वैज्ञानिकों ने इस स्तंभ पर मेसाबाइट की एक पतली परत की खोज की है जो कि लोहे ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन से बनी है । स्तंभ के निर्माण के 3 साल बाद ही यह परत अस्तित्व में आई और धीरे-धीरे बढ़ रही है । 1600 साल के बाद भी यह परत 1 मिलीमीटर का 20 वा भाग ही बढी है ।

विशेषज्ञों का मानना है कि लोहे में फास्फोरस की उच्च मात्रा ने इस परत के निर्माण को बढ़ाया है। जिसमें फास्फोरस कि मात्रा 1% है । आज के समय की बात करें तो लोहे में फास्फोरस कि मात्रा 0.5% होती है ।

कुछ फास्फोरस की मात्रा भारत में लोहे निर्माण की तकनीक की एक पहचान थी । जिसमें चारकोल को मिलाकर के लोह में बदला जाता था । यह रिश्ता में विज्ञान तथा रहस्य का अनोखा रहस्य है