प्रदूषण का जानवरों पर क्या कैसे असर होता है ? प्रदूषण की समस्या और समाधान

जानवरों पर पड़ रहा प्रदूषण का सीधा असर जानवरों पर प्रदूषण का क्या प्रभाव पड़ता है

प्रदूषण का जानवरों पर क्या कैसे असर होता है ? प्रदूषण की समस्या और समाधान

प्रदूषण से इंसान ही नहीं जानवरों का भी बुरा हाल जानवरों पर प्रदूषण का क्या प्रभाव पड़ता प्रदूषण का पौधों और जंतुओं पर प्रभाव प्रदूषण से पक्षी भी परेशान, प्रजनन क्षमता हो रही प्रभावित पर्यावरण प्रदूषण की समस्या और समाधान

अपने दैनिक जीवन की क्रियाकलापों को संपन्न करने के लिए तथा आपसी संवाद स्थापित करने के लिए कुछ जरूरी क्रिया कलाप होते हैं । इन्हीं क्रियाकलाप की मदद से हम एक दूसरे से संवाद कर पाते हैं तथा पशु पक्षी भी इसी तरह से संवाद कर पाते हैं ।

पशु तथा पक्षी एक दूसरे से संवाद करने के लिए गंध , स्पर्श , आवाज जैसे संकेतों के माध्यम से एक-दूसरे से संवाद करते हैं ।

पशु पक्षी संवाद करने के लिए किन तरीकों को अपनाते हैं ?

इसी प्रदूषण के कारण आज इनकी संवाद में बाधा पहुंच रही है । जिसके कारण वे सही ढंग से संवाद नहीं कर पा रहे हैं । यह प्रदूषण मनुष्यों के लिए ही नहीं पशु पक्षियों के लिए भी आज खतरा बनता जा रहा है ।

शोध तथा अध्ययन से यह भी पता चला है कि प्रदूषण के कारण पशु तथा पक्षियों में खानपान तथा प्रजनन क्षमता में काफी बदलाव देखा गया है तथा इसका असर उन पर काफी गिरा पड़ा है ।

प्लास्टिक का जीव जंतु पर क्या असर हो रहा है ?

प्रदूषण को फैलाने में प्लास्टिक की अहम भूमिका रही है । प्लास्टिक के कारण आज के जीव खतरे में है । प्लास्टिक के कारण ही जीव जंतुओं का व्यवहार बदल रहा है । वैज्ञानिकों ने समुद्री घोंघे पर रिसर्च किया तथा उसके आधार पर कुछ नतीजे निकाले ।

सामान्य रूप से घोंघे को केकड़े के पानी में घुले रसायन के गंध से अपने आस पास केकड़ो के होने का पता चल जाता है । जिसके बाद वह बचाव के लिए अपने खोल में चले जाते हैं ।

क्या प्लास्टिक से जीव जंतुओं का व्यवहार बदल रहा है ?

लेकिन जब वैज्ञानिकों ने घोंघे को प्लास्टिक के टुकड़ों से भरे पानी में रखा , तब वह केकड़ी के प्रति अपनी स्वाभाविक प्रतिक्रिया नहीं दे पाए । वैज्ञानिकों ने बताया कि प्लास्टिक के कारण घोंघे खतरे को भांप नहीं पा रहे हैं ।

यदि ऐसा हुआ तो केकड़े शिकार से अपनी रक्षा नहीं कर पाएंगे । वैज्ञानिकों ने बताया कि यह है बात पानी में रहने वाले सभी प्रजातियों के जीवो पर भी लागू होती है जो कि अपने आसपास की दुनिया को समझने के लिए रसायन पर निर्भर रहते हैं ।

जीव जंतु एक-दूसरे से बातचीत करने के लिए या फिर संपर्क स्थापित करने के लिए अपने इंद्रियों का इस्तेमाल करते हैं वे हिंदुओं के तौर पर गंद सवाद टच फेरोमोन तथा हार्मोन का प्रयोग करते हैं ।

प्रदूषण से जीव जंतुओं में क्या क्या असर देखने को मिल रहा है ?

यदि किसी भी युग के संपर्क करने वाले मार्ग में कोई दूसरी वस्तु आ जाती है तो उनके तब बात करने की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होती है और वह चीजों को सही ढंग से समझ नहीं पाते हैं इनका उनके व्यवहार पर भी काफी असर पड़ता है ।

उदाहरण के तौर पर समुद्र में बहुत सारी मछलियां रहती है और यदि हम समुद्र में बहुत ज्यादा नाव चलाते हैं तब नाव की वजह से समुद्र में शोरगुल उत्पन्न होता है और मछलियां अपने पेट भरने के लिए शिकार को ढूंढ रही होती है तब वह शिकार को घूम नहीं पाती है क्योंकि मछलियां शिकार को ढूंढने के लिए एकोलोकेशन का उपयोग करती है ।

क्योंकि शोरगुल से जानवरों का ध्यान भटकता है और वह शिकार नहीं कर पाते हैं या फिर उन्हें बहुत सारी अन्य दिक्कतों का भी सामना करना पड़ता है ।

जानवरों पर किस किस तरह के पोलूशन का असर पड़ा है ?

जानवरों पर ध्वनि पोलूशन , वाटर पोलूशन तथा एयर पोलूशन । इन तीनों का असर पड़ता है । हालांकि जानवरों पर रिसर्च नहीं होती फिर भी इन सब का आंचल जब मनुष्य पर पड़ सकता है तो जानवर पर क्यों नहीं पढ़ सकता है ।

इसके साथ ही हम जो भी पेस्टिसाइड अपने दैनिक जीवन में उपयोग के लिए लेते हैं वह भी इन जानवरों के लिए काफी हानिकारक होता है । यह पेस्टिसाइड इन जानवरों पर भी काफी बुरा असर डालता है । जिनसे कि इनकी हार्मोनल गतिविधियां चेंज हो जाती है । इनसे इनकी प्रजनन क्षमता में भी बदलाव होता है।