कुबेर लोक के कोषाध्यक्ष सुमति तथा कुमति की कहानी ।

कुबेर लोक के कोषाध्यक्ष सुमति तथा कुमति की कहानी ।

यह कहानी कुबेर लोग से जुड़ी हुई है । यह कहानी तब की है जब कुबेर लोक के राजा धन कुबेर थे । कुबेर लोग के राज्य में कुमति तथा सुमति दो भाई रहते थे ।

सुमति कि नींव न्याय , सत्य , तथा धर्म पर टिकी हुई थी । जबकि कुमति के निव अन्याय , अधर्म तथा असत्य पर टिकी हुई थी ।

कुमति सत्य तथा धर्म पर होने के कारण कुबेर देव ने उसे कुबेर लोग का कोषाध्यक्ष नियुक्त कर दिया । जिसके फलस्वरूप कुमति जलने लगा तथा हमेशा बदले की भावना में जलता रहता था ।

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एक दिन धन कुबेर ने सुमति को एक विशेष कार्य के लिए धरती लोक पर भेजने का निर्णय लिया । जिस कार्य के लिए सुमति को भेजा गया था । उसमें धरती लोगों के राजा दक्ष की पत्नी के लिए विशेष रुप से आभूषण बनाए गए थे । उन आभूषणों को राजा दक्ष तक पहुंचाना था ।

सुमति उन आभूषणों को लेकर के वहां से धरती लोग पर आ गए । कुबेर लोग से राजा दक्ष का राज्य काफी लंबा तथा निर्जन स्थानों से होकर जाता था । रास्ते में एक नदी भी थी ।

उस नदी को देखकर सुमति के मन में स्नान करने का विचार आया और वह स्नान करने के लिए नदी में उतर गए । स्नान पर जाते समय सुमति ने उन आभूषणों तथा कपड़ों को नदी के किनारे पर ही छोड़ दिया ।

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जैसे ही सुमति स्नान के लिए नदी में गए मौका पाकर के सुमति के भाई कुमति ने उन आभूषणों को वहां से चुरा लिया ।

कुमति नाग लोक के राजा तक्षक से मिला हुआ था । जब सुमति पानी में स्नान के लिए गया था । तब नागराज तक्षक ने नाग कन्याओं को भेज के सुमति को मूर्छित कर दिया। मूर्छित करने के बाद वह सुमति को नागराज तक्षक के पास ले गए उसके दरबार में ।

वहां पर नागराज तक्षक तथा कुमति ने मिलकर सुमति को फंसाने का एक षड्यंत्र रचा । तब नागराज तक्षक ने सुमति से कहा कि हमने सुना है कि आप राजा दक्ष के राज्य में जा रहे हो ।

तब सुमति ने भी कहा कि हां मैं राजा दक्ष के राज्य में जा रहा हूं । तब नागराज तक्षक ने कहा कि जाते-जाते एक मेरा भी काम कर दोगे क्या ?

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तब सुमति ने भी हां कर दी कि हां मैं आपका भी काम कर दूंगा । तब नागराज तक्षक ने कहा कि यह नागमणि राजा दक्ष तक पहुंचानी है तब सुमति ने भी हां कर दिया और बोला कि मे यह नागमणि राजा दक्ष तक पहुंचा दूंगा ।

सुमति वहां से नागमणि लेकर के जब नाग लोक से बाहर निकले और नदी के तट पर पहुंचे तब उन्होंने देखा कि वहां से आभूषण गायब थे । सुमति ने हर तरफ उन भूषण को ढूंढा पर कहीं पर भी आभूषण नजर नहीं आए ।

सुमति थके हारे फिर से कुबेर लोग जाने का निर्णय लिया । जब सुमति कुबेर लोग पहुंचे और उन्होंने धनकुबेर को यह बताया कि मैं वह गहने लौटाने में असमर्थ रहा और वह आभूषण चोरी हो गए ।

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उसी समय सुमति का भाई कुमति भी वहां पर पहुंच गया और उन्होंने उस षड्यंत्र का ही सहारा सुमति को फंसाने के लिए लिया । कुमति ने धन कुबेर को कहा कि आप एक बार सुमति की तलाशी लीजिए ।

जब सुमति की तलाशी ली गई थी । तब सुमति के पास से नागमणि निकली । क्योंकि सुमति आभूषणों की चिंता के कारण नागमणि को बिल्कुल भी भूल गए थे और नागमणि उनके पास ही थी ।

कुमति ने उन पर यह आरोप लगाया कि वह इन आभूषणों को बेच करके नागमणि खरीद ली है । इस बात पर धनकुबेर को भी विश्वास हो गया कि उन्होंने इन गहनों के बदले में नागमणि को खरीद लिया है ।

सुमति ने धन कुबेर से काफी अनुरोध किया की मैंने यह नागमणि उन आभूषणों के बदले नहीं खरीदी है, यह तो नागराज तक्षक ने मुझे राजा दक्ष को देने के लिए कहा था ।

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तभी कुमति बीच में बोल पड़ा और बोला कि तुमने ही नागराज तक्षक को नागमणि राजा दक्ष तक पहुंचाने के लिए क्यों कहा ? क्या तुम उसके सगे संबंधी हो ?

कुमति की इस बात से धन कुबेर विचलित हो गए तथा उन्होंने कुमति की बात को ही सही ठहराया और सुमति को गलत ठहराया ।

तभी धनकुबेर बहुत ज्यादा ही क्रोधित तथा कुपित हो गए और उन्होंने सुमति को कुबेर लोग से निष्कासित कर दिया तथा उसके पद से भी निष्कासित कर दिया और उसके स्थान पर सुमति के भाई कुमति को कुबेर लोग का कोषाध्यक्ष नियुक्त कर दिया ।

अब सुमति धरती लोक पर आ गया और सूर्य देव की उपासना करने लगा । लेकिन सूर्यदेव भी इस समस्या का निदान नहीं कर पा रहे थे । तब सूर्यदेव के शिष्य मारुति ने इस समस्या का हल निकालने का निर्णय लिया ।

सूर्यदेव के शिष्य मारुति सबसे पहले तो धनकुबेर के पास सुमति की याछना लेकर गए । लेकिन धनकुबेर ने उनकी याचना को भी ठुकरा दिया और उन्हें गलत साबित कर दिया ।

अब कुबेर लोक से मारुति निराश होकर के नागराज तक्षक के लोक में जाने का निर्णय लिया तथा वह नागराज तक्षक के लोक में पहुंचे ।

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नागराज तक्षक को अपनी शक्ति तथा सोने का अभिमान बहुत ज्यादा ही हो गया था । इस कारण से वह भगवान शिव के 11 रुद्र अवतार को नहीं पहचान पाए और उनसे युद्ध करने लग गए ।

तब सूर्यदेव के शिष्य मारुति ने उन्हें परास्त कर अपने असली स्वरुप के दर्शन कराए और नागराज को दंड देने का निर्णय लिया । तब नागराज तक्षक उनके पैरों में गिर कर के क्षमा याचना करने लगा ।

तब मारुति ने कहा कि शमा याचना ही करनी है तो सुमति से कीजिए । तब नागराज तक्षक कुबेर लोग पर गए और सारी कहानी धन कुबेर को बताई । इसके साथ ही नागराज तक्षक ने सुमति से क्षमा मांगी ।

जब नागराज तक्षक ने कुमति तथा अपने षड्यंत्र को धनकुबेर को बताया तब वह खुद भी इस षड्यंत्र के बारे में सोच कर के हैरान हो गए और उन्होंने कुमति को कोषाध्यक्ष पद तथा कुबेर लोग से निष्कासित करके पुनः सुमति को कुबेर लोग का कोषाध्यक्ष नियुक्त कर दिया ।

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