जानिए क्या है पितृपक्ष और क्यों किया जाता है श्राद्ध ?

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आज हम पितरों की एक घटना या फिर कहानी की बात करेंगे । यह कहानी पितरों की समस्या से संबंधित है । बात उस समय की है जब हमारे पितरों तक हमारे द्वारा किए गए पिंडदान तथा तर्पण का भोजन उन तक नहीं पहुंच पाता था ।

जानिए क्या है पितृपक्ष और क्यों किया जाता है श्राद्ध ?

एक समय की बात है जब धरती लोग के निवासी अपने पितरों के लिए शराब तथा तर्पण करते थे । तब उनके द्वारा प्रदान किया गया भोजन उन तक नहीं पहुंच पाता था ।

धरती वासी जब भी तर्पण करते उनका भोजन प्रेत योनि के साथ ले जाते थे तथा हमारे द्वारा किया गया तर्पण उन तक यानी कि हमारे पितरों तक नहीं पहुंच पाता था ।

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इस समस्या को लेकर के सूर्यदेव के पास गए । तब सूर्यदेव ने इस समस्या के निदान के लिए अपने शिष्य मारुति को इस कार्य के लिए धरती लोग पर भेजा ।

तब सूर्यदेव के शिष्य मारुति धरती लोग पर गए तथा राजा विराट से इस समस्या के बारे में बताया और कहा कि आप पित्र पूजा की तैयारी करें ।

जैसे ही पित्र पूजा समाप्त हुई । पिंडदान के पश्चात तर्पण की बारी आई । उसी समय प्रेत योनि के परे तथा पिशाच वहां पर पहुंच गए और पितरों को अर्पित किया गया भोजन वहां से ले जाने लगे ।

तब पवन पुत्र मारुति ने उन्हें रोका और समझआया कि इस प्रकार की गलती ना करें । लेकिन प्रेत योनि के प्रेत बिल्कुल भी नहीं माने और भोजन लेना ले जाने लगे ।

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तब पवनपुत्र मारुति ने उनका पीछा किया तथा उन्हें दंडित किया और यह भी कहा कि पुने धरती लोक पर नहीं आए अन्यथा परिणाम अच्छा नहीं होगा

पराजित प्रेत जब प्रेत लोक के राजा ब्रह्मराक्षस के पास जाकर के हनुमान की चुनौती को बताते हैं । तब ब्रह्मराक्षस गुस्से में आकर के अपने दो शक्तिशाली असुरों को पृथ्वी पर विनाश के लिए भेजता है ।

उन दो अशुर के नाम जो की धरती पर विनाश के लिए आते हैं उनका नाम करकट तथा अमर था । करकट तथा मर्कट धरती लोक पर आकर के विनाश करने लगते हैं । तब मारुति उनको रोकते है । तथा मारपीट करके उनकी बुरी हालत करके उन दोनों असुरों को फिर से प्रेत लोक भेज दिया ।

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जब ब्रह्मराक्षस को पता चलता है तब वह अपनी पूरी प्रेत सेना को ले करके धरती लोग पर आता है तथा विनाश करता है और चला जाता है।

इस बात पर पवनपुत्र मारुति को बहुत ज्यादा गुस्सा आता है और उन्होंने अपने तंत्र शक्ति से उन सभी प्रेतों को बंदी बना लेते हैं । जिन तंत्र विद्या से हनुमान प्रेतों को बंदी बनाते हैं वहीं तंत्र आगे चलकर के हनुमंत तंत्र के नाम से विख्यात हुआ ।

उन सभी प्रेतों को बंदी बनाने के बाद में सूर्य देव के आदेश पर मारुति ने उनकी मुक्ति के लिए तथा पितरों की समस्या के समाधान के लिए आगे की खोज पर निकल गए ।

उसके बाद में पवनपुत्र मारुति कथा नारद मुनि इस समस्या के समाधान के लिए ब्रह्मलोक में ब्रह्मदेव के पास गए । ब्रह्मदेव को इन सारी समस्याओं से अवगत कराया । ब्रह्मदेव ने पितरों की समस्या के लिए स्थाई समाधान निकाला ।

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पितरों की इस समस्या के समाधान के लिए ब्रह्मदेव ने अपनी मानस पुत्री श्वेता को जन्म दिया । पितरों की इस समस्या का स्थाई समाधान के लिए श्वेता का विवाह पितरों के अग्रज सोमपा से करवाया ।

इन सब के पश्चात पवनपुत्र मारुति ने अकाल मृत्यु के कारण भटक रहे पिशाच योनि में तथा प्रेत योनि में आत्माओं की मुक्ति के लिए एक और तंत्र की स्थापना की । जिससे कि आम मनुष्य भी भूत प्रेत से मुक्ति पा सकता है ।

इन सब के पश्चात ब्रह्मदेव धरती लोक पर आए तथा धरती वासियों तथा यहां के ब्राह्मणों को पितृ पूजा की पूरी विधि बताई ।

जैसा कि आप सभी जानते ही हैं कि पितृपक्ष जिसे श्राद्ध के नाम से भी जाना जाता है । आश्विन मास के कृष्ण पक्ष मैं आता है ।

पित्र पूजा की इस विधि में ब्रह्मदेव ने बताया कि सबसे पहले आपको पितरों की देवी श्वेता देवी की पूजा अर्चना करनी होगी तथा श्वेता देवी का आवाहन करना होगा । श्वेता देवी की स्थापना के लिए इसे मूर्ति रूप में तथा मंगलमय कलश के रूप में इसकी स्थापना की जानी चाहिए ।

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श्वेता देवी की पूजा के पश्चात अपने पितरों का ध्यान करके उन्हें पिंडदान तथा तर्पण करना चाहिए ।

यदि कोई इस विधि से अपने पितरों का पिंडदान तथा तर्पण करता है तब उनके द्वारा किए गए तर्पण उनके पितरों तक जरूर पहुंचेगा ।

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