रावण अमर कैसे हुआ ? रावण की नाभि में अमृत कैसे स्थापित किया गया ?

रावण अमर कैसे हुआ ? रावण की नाभि में अमृत कैसे स्थापित किया गया ?

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दोस्तों आपने रामायण तो देखी होगी । आपने रामायण में यह भी सुना होगा कि रावण को अमरता का वरदान था । रावण की नाभि में अमृत आरोपित किया गया था । जिसके कारण रावण अमर हो गया था ।

उसे मारना कोई साधारण बात नहीं थी । लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि रावण की नाभि में इस अमृत को स्थापित कैसे किया गया । आज हम इसी के बारे में बात करेंगे ।

एक समय की बात है बाली और रावण के बीच युद्ध हुआ । जिसके परिणाम स्वरूप इस युद्ध में महाराज लंकेश को शरीर के अंदरूनी चोट लगी । जिससे कि लंकापति रावण बहुत ज्यादा बीमार पड़ गया था ।

इसी बात को लेकर मंदोदरी बहुत ज्यादा चिंतित हो गई और उसने मन ही मन में यह निर्णय लिया कि मैं महाराज रावण को अमर बना कर ही रहूंगी ।

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मंदोदरी ने अपने पति को अमर बनाने के लिए अपने माता-पिता की सहायता ली । मंदोदरी अपने माता-पिता के पास पहुंची और उन्होंने अपनी सारी आपबीती बताई ।

इससे उसके माता-पिता ने हां कर दी । लेकिन समस्या यह थी कि मंदोदरी के पास उड़कर के जाने की शक्ति नहीं थी । इसलिए मंदोदरी की मां के पास यह सकती थी ।

उसके बाद में मंदोदरी की मां ने सारी शक्तियां मंदोदरी को दे दी थी । क्योंकि मंदोदरी की मां एक देवी स्त्री थी ।

मंदोदरी की मां से मंदोदरी ने शक्तियां प्राप्त करके वह चंद्रलोक चली गई । चंद्रलोक में जा करके उन्होंने चंद्र देव के सामने अपने पति यानी कि लंकापति रावण की दीर्घायु के लिए पूजा का बहाना बनाने का ड्रामा रचा ।

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चंद्र देव तथा वहां के देवता इस बात को समझ नहीं पाए कि मंदोदरी की चाल क्या है । मंदोदरी यहां क्यों आई है ?

वैसे तो साधारण व्यक्ति इस अमृत कलश के कुंड को नहीं चुरा सकता । क्योंकि मंदोदरी के पिता द्वारा उसे स्वर्ग लोक में स्थापित किया गया था । वह भी बहुत ही चमत्कारिक तथा विद्युत शक्तियों के द्वारा इस कलश को स्थापित किया गया था ।

जिससे कि कोई भी व्यक्ति इस नहीं ले जा सकता । यदि कोई व्यक्ति आकाश मार्ग से उड़कर भी आता है तो इसके नीचे से बहुत सारी विषैली गैसें निकलती है जिससे किसकी मृत्यु हो जाती है और यदि कोई व्यक्ति इसके पास चलकर जाए तो भी उसकी मृत्यु निश्चित होती है ।

क्योंकि इनके चारों ओर गर्म लावा निकलता रहता है । इसलिए सामान्य मनुष्य के लिए इस अमृत कलश को चुराना कोई साधारण बात नहीं थी ।

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चंद्रलोक का एक नियम है कि चंद्र देव हर महीने की पूर्णिमा के दिन इस अमृत कलश को वहां से निकालते हैं तथा धरती वासियों के कल्याण के लिए कुछ बूंदे धरती पर गिराते हैं ।

अब मंदोदरी के सामने यह अच्छा मौका था । क्योंकि जिस दिन मंदोदरी गई थी उसके 2 दिन बाद ही पूर्णिमा थी । इसलिए मंदोदरी को अमृत कलश चुराने का अच्छा मौका मिल गया ।

जैसे ही पूर्णिमा की रात्रि को चंद्र देव ने अमृत कलश वहां से बाहर निकाला तभी रावण की पत्नी मंदोदरी ने मौका पाकर के अमृत कलश को चुराकर के भागने लगी ।

जिसके कारण देवताओं को इसका पता चल गया और देवताओं ने मंदोदरी का पीछा किया । पीछा करने पर मंदोदरी बहुत ज्यादा ही घबरा गई और उसने अमृत कलश को देवलोक में ही छोड़ दिया तथा उसमें से अमृत की कुछ बूंदों को अपनी किसी अंगुटी में भर कर के अपने साथ लेकर आ गई ।

मंदोदरी अमृत कलश लेकर धरती लोक पर पहुंच गई थी । उसके बाद उसने रावण को अमर करने के लिए अपने देवर विभीषण का सहारा लिया । वही एकमात्र लंका में ऐसे व्यक्ति थे जो कि धर्म , पूजा पाठ तथा सकारात्मक प्रकृति के विचारधारा वाले व्यक्ति थे ।

मंदोदरी ने यह सारी घटना विभीषण को बताई । विभीषण भी इस बात के लिए राजी हो गया । लेकिन विभीषण ने एक सशर्त रखी कि इस बात का पता हमारे दोनों के अलावा और किसी को नहीं होना चाहिए ।

इस बात से रावण की पत्नी मंदोदरी भी सहमत हो गई और उन्होंने पूर्णिमा के दिन ही इस अमृत की बूंद को रावण की नाभि में स्थापित करने का निर्णय लिया ।

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पूर्णिमा की रात्रि को मंदोदरी तथा विभीषण ने रावण को अशोक वाटिका में बुलाकर के मदिरा के साथ कुछ जड़ी बूटियां पिलाकर के रावण को बेहोश या अचेत किया गया ।

रावण की अचेत होने के बाद कमल नाल पद्धति द्वारा विभीषण ने उस अमृत की बूंदों को रावण की नाभि में स्थापित कर दिया । जिसके कारण रावण अमर हो गया । अब रावण का सिर भी कट जाता है तो भी वह जिंदा रहेगा । इस प्रकार रावण की नाभि में अमृत स्थापित किया गया ।

अमृत रावण की नाभि में ही स्थापित क्यों किया गया था ?

क्योंकि जो अमृत की बूंदे मंदोदरी रावण के लिए लेकर आई थी । वह पर्याप्त नहीं थी । हमारे शरीर में समस्त नाड़ियों का केंद्र नाभि में होता है । इसलिए यदि नाभि में अमृत को पहुंचा दिया जाए तो यह हमारे शरीर के हर नाडी में पहुंच जाता है । इसीलिए विभीषण ने नाभि को ही चुना ।

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