जय जय जय बजरंगबली जय जय जय बजरंगबली जय जय जय बजरंगबली जय जय जय बजरंग जा जा जा बजरंगबली

संजीवनी बूटी की उत्पत्ति कैसे हुई थी

संजीवनी बूटी की उत्पत्ति कैसे हुई थी

आज हम संजीवनी बूटी की बात करेंगे । पुराणों में तथा वेदों में इसका उल्लेख मिलता है कि यदि इस बूटी को किसी भी व्यक्ति को दिया जाए तो यह बूटी मरे हुए इंसान को भी जिंदा कर सकती है । इस बूटी में इतनी ताकत होती है । शुरुआत में बात की जाए तो इस विद्या का ज्ञान असुरों के गुरु शुक्राचार्य को ही था ।

असुर गुरु शुक्राचार्य असुरों के गुरु थे । इसलिए जब भी युद्ध होता था तब दे देत्य गुरु शुक्राचार्य इस जड़ी बूटी का उपयोग करके असुरों को पुनर्जीवित करते थे

एक समय की बात है । असुर गुरु शुक्राचार्य के निर्देशन में उसका शिष्य जालंधर इंद्रलोक पर आक्रमण करने चला गया । आक्रमण करने पर सारे देवता परास्त हो गए तथा जालंधर ने सभी देवताओं को परास्त करके मार दिया ।

इस घटना से इंद्र बहुत ज्यादा ही उदास हो गया । इसके पश्चात इंद्र तथा देवताओं के गुरु बृहस्पति ने मिलकर एक उपाय ढूंढा । उस समय ही संजीवनी विद्या का ज्ञान देवताओं के गुरु बृहस्पति को भी था ।

अवश्य पढ़े – WhatsApp banned होने के कारण WhatsApp बार-बार banned क्यों होता है

देव गुरु बृहस्पति द्रोणागिरी पर्वत पर गए तथा वहां पर से संजीवनी बूटी लेकर आए तथा उन्होंने देवताओं को पुनः जीवित कर दिया । जब जालंधर ने देखा कि मैं जिस देवता को मार रहा हूं वह पुनर्जीवित हो करके मुज से युद्ध कर रहा है तब वह असमंजस्य में पड़ गया

उसके बाद जालंधर असुर गुरु शुक्राचार्य के पास गया तब शुक्राचार्य ने बताया कि यह देव गुरु बृहस्पति का किया धरा है । इन सब का पता चलते ही जालंधर बहुत ज्यादा ही क्रोधित हो गया ।

उसके बाद में जालंधर गुस्से में आकर द्रोणागिरी पर्वत को समुद्र की गहराई में फेंक दिया । इस प्रकार से कई वर्षों तक लगातार द्रोणागिरी पर्वत समुद्र में रहा । जिसके कारण उसकी सारी जड़ी बूटियां ओषघियां तथा संजीवनी जड़ी बूटी भी खत्म हो गई थी ।

एक समय की बात है पवन पुत्र हनुमान के पिता को रावण के द्वारा भेजे गए मायावी असुर द्वारा प्राण घातिनी शक्ति लगी । इस शक्ति का उपचार सिर्फ संजीवनी बूटी ही था ।

यदि संजीवनी बूटी मिल जाए तो केसरी का उपचार हो सकता था । लेकिन इस समय द्रोणागिरी पर्वत पानी में डूबा हुआ था और संसार में संजीवनी बूटी नहीं थी । संजीवनी बूटी इस संसार से विलुप्त हो चुकी थी ‌।

संजीवनी बूटी लुप्त होने के बाद में देवताओं पर संकट मंडराने लगा । असुर बार-बार देवताओं पर आक्रमण करते तथा देवताओं को हानि पहुंचाते । इससे परेशान होकर के बृहस्पति के पुत्र कच्छ गुरु शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या सीखने का निर्णय लिया और वह अपने पिता की आज्ञा से गुरु शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या सीखने के लिए चला गया ।

शुरुआत में तो शुक्राचार्य ने उसे शिष्य मानने से इंकार कर दिया । लेकिन बाद में शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री के आग्रह पर उन्होंने शिष्य बना दिया । कच ने बड़ी ही निष्ठा तथा सेवा भाव से शुक्राचार्य की सेवा करके उनका दिल जीत लिया ।

अवश्य पढ़े – कान में यह चीजें गलती से भी भूलकर ना डालें

कच्छ शुक्राचार्य का परम शिष्य बन चुका था । यह बात असुरों को अच्छी नहीं लगी और उन्होंने कच्छ को मारने का निर्णय लिया । इस प्रकार मौका पाकर के असुरों ने कच्छ का वध कर दिया । लेकिन शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या से पुने जीवित कर लिया

इतना होने के बाद भी असुर नहीं माने । उन्होंने एक बार फिर से कच्छ को मारना चाहा और वह इसमें सफल भी हो गए । इस बार उन्होंने कुछ अलग ही किया । उन्होंने कच को मार कर के उसकी राख को देत्य गुरु शुक्राचार्य को ही पिला दिया ।

जब गुरु शुक्राचार्य को इस बात का पता चला तब गुरु शुक्राचार्य ने कच्छ को पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया और उन्होंने यह भी निर्णय लिया कि आज मैं अपनी संजीवनी विद्या कच्छ को दूंगा । जिससे कि मेरी मृत्यु के पश्चात कच्छ मुझे पुनर्जीवित कर सकेगा

तब शुक्राचार्य ने अपनी संजीवनी विद्या कच्छ को दी ओर कच्छ गुरु शुक्राचार्य के पेट को फाड़ कर के बाहर निकला और गुरु शुक्राचार्य को पुनर्जीवित किया ।

उधर शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी मन ही मन में कच्छ से प्रेम करने लगी थी । लेकिन जब कच्छ का जन्म शुक्राचार्य के पेट से हुआ तब शुक्राचार्य कच्छ के पिता तथा कच्छ उसके पुत्र हो गए । इससे पूरे रिश्ते ही बदल गए । जिसके कारण देवयानी तथा कच्छ एक दूसरे के भाई-बहन बन गए ।

अब इस संसार के सामने एक विकट समस्या उत्पन्न हो गई थी । तब पवनपुत्र मारुति ने असुर गुरु शुक्राचार्य के पास गए । अब तक शुक्राचार्य ने अपनी सारी शक्तियां बृहस्पति के पुत्र कच्छ को दे चुके थे ।

क्योंकि उनके पास अब कोई भी शक्ति नहीं बची थी । इसलिए अब संजीवनी विद्या का ज्ञान देव गुरु बृहस्पति के पुत्र कच्छ के पास थी ।

अवश्य पढ़े – इंडिया में टॉप बिस्किट सेलिंग कंपनियों के नाम।

जब कच्छ तथा देवयानी भाई-बहन बन गए ,तब कच्छ वहां से जाने लगा । उसी समय देवयानी ने कच को शराब दे दिया और कच्छ अपनी संजीवनी विद्या फिर से भूल गया ।

लेकिन विडंबना यह थी कि कच को शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी का शराब था । कच्छ श्राफ के कारण ही संजीवनी विद्या को भूल चुका था । यदि पवनपुत्र मारुति को संजीवनी विद्या प्राप्त करनी है तो उसे सबसे पहले कच्छ के शराब को दूर करना होगा ।

इसके लिए मारुति ने कच्छ के शराब को दूर करने के लिए सबसे पहले द्रोणागिरी पर्वत को समुद्र की गहराई से निकालकर के हिमालय श्रंखला में पुनर्स्थापित किया ।

उसके पश्चात मारुति चंद्रलोक गये । उन्होंने चंद्रलोक में देवताओं तथा चंद्र देव से प्रार्थना की । क्योंकि चंद्रदेव जड़ी बूटियों के स्वामी है । जब मारुति ने संजीवनी बूटी को पुनर्जीवित करने के लिए कहा तो इस बात को लेकर सभी देवता सहमत हो गए ।

सारे देवता एकत्र होकर द्रोणागिरी पर्वत पर पहुंचे और एक अनुष्ठान किया इसके पश्चात संजीवनी बूटी का पुनर्जन्म हुआ ।

Translate »
%d bloggers like this: