शिकार करने का तरीक़ा सीख सकें

बड़े झुंड को चीते से डरने की ज्यादा जरूरत नहीं होती है । यह बात चिता भी जानता है । चिता अकेला नहीं है । वह अपने भाई के साथ मिलकर शिकार कर रहा है ।

उन्होंने तेजी से शिकार पर हमला किया तथा छलांग लगाकर शिकार को नीचे गिरा दिया । चीते के काटने वाले दांत बहुत छोटे होते हैं । वह बहुत मुश्किल से ही शिकार की चमड़ी को काट पाते हैं ।

जबड़े का आकार पकड़े रहने के लिए एकदम सही है। कुछ मिनटों तक गर्दन को मजबूती से पकड़े रहना होगा । जब शिकार छटपटाना कम कर देता है , तब एक चीता शिकार पर से अपनी पकड़ ढीली कर देता है ।

जब एक चीते ने शिकार खाना शुरू किया तो दूसरा चिता यह देख रहा था कि आसपास कोई खतरा तो नहीं है । यह शिकार इनके लिए एक वरदान है । यह दोनों भरपेट खाना खाएंगे ।

एक चीते को 1 दिन में लगभग 4 किलो मांस की जरूरत पड़ती है । खाने की बात करें तो वह 14 किलो तक भी खा सकते हैं । उस हालत में चार-पांच दिनों तक शिकार किए बिना भी रह सकता है ।

दूसरे बिल्लियों की तरह चिता अपने शिकार को पंजे में पकड़ कर वहीं पर खाता है । चिता जल्दी-जल्दी शिकार को खाता है । कहीं कोई दूसरा शिकारी उसका शिकार चुराने ना आ जाए ।

मिलकर शिकार करने की वजह से चीते को अच्छी दावत मिल गई है । एक निगरानी कर रहा है तथा दूसरा आराम से खा रहा है । खतरा हर दिशा से आ सकता है । चीते को लकड़बग्घा तथा शेरों से खास खतरा बना रहता है ।

चीते इतने ताकतवर नहीं होते हैं कि उनका सामना कर सकें । यदि वह यहां पर आ गए तो चीते को अपना शिकार छोड़ना पड़ेगा ।

चीते ने मिलकर शिकार करने की रणनीति अपनाई है । जिससे शिकार की संभावनाएं बढ़ गई है । जिसकी वजह से यह शिकार को पूरा खा सकते हैं । जबकि दूसरी बिल्लियां कोई दूसरी रणनीति अपनाती है ।

तेंदुए का शिकार भी अक्सर चुरा लिया जाता है । वैसे वह अच्छे शिकारी होते हैं । उनका शरीर मजबूत घटा होता है । चीते को छोड़कर के अफ्रीका के सभी जानवरों के सामने उनको हार माननी पड़ती है ।

एक तेंदुआ पेड़ पर छिपा बैठा है । क्योंकि शेर के एक परिवार ने उनको घेर रखा है । शेरों की दिलचस्पी पेड़ पर लटकी शिकारी की लाश पर है ने कि तेंदुए पर है । चोरी से शिकार को बचाए रखने के लिए तेंदुआ अपने शिकार को पेड़ पर ले जाता है ।

चिते के मुकाबले तेंदुए बार-बार आ करके अपने भोजन को खाते हैं । इसलिए उनके भंडार का सुरक्षित होना आवश्यक होता है ‌।

इस नजरिए से यह पेड़ तेंदुए के लिए बिल्कुल सही स्थान है । यह तेंदुए की सोची-समझी रणनीति नहीं है । यह इनकी सहज परवर्ती है तथा न हीं वह ऐसा करते हैं ।

जिन देशों में तेंदुए को दूसरे शिकारियों से खतरा नहीं होता है । वह अपने शिकार को जमीन पर ही खाते हैं और उसे वहीं पर छोड़ जाते हैं । मौका पाते ही तेंदुआ वहां से भाग गया है ।

ऊंची घास के यह मैदान उठाई गिरोह तथा मौकापरस्त शिकारियों से भरे पड़े हैं । कुछ जानवर ऐसे होते हैं जो कि किसी कारण से खुद शिकार नहीं करते हैं ‌।

पर दूसरों के द्वारा किए गए शिकार की ताक में रहते हैं । गिद्ध , लकड़बग्घे दोनों ही इस काम में माहिर है ‌।

शेरनी के पास खाने के लिए कई विकल्प उपलब्ध है । शेरनीया सामान्य से कई बार सड़ा हुआ मांस खा सकती है । वह चीते को डरा करके उसका शिकार खा सकती है । वह ऐसे छोटे जानवर का शिकार कर सकती है जिन्हें वह शिकार के लायक नहीं समझते हैं ।

शेर तथा उसके शिकार दोनों ही इस परिवेश से जुड़े हुए हैं । इन के आपसी संबंध बहुत ही दिलचस्प तथ्य पेचीदा होते हैं ।

करोड़ों वर्षों से दोनों का विकास इसी परिवेश में साथ साथ हुआ है । पर आज भी किसी एक के पलड़ को भारी नहीं कहा जा सकता है ।

शिकार ने अपने बच निकलने के लिए नए तरीके विकसित कर लिए हैं । वहीं शिकारियों ने अपने हमले की रणनीतियों को तथा शिकार के तरीकों को बदल दिया है ।

चीते हर बार किसी खुले इलाके में शिकार करना पसंद करते हैं । क्योंकि ऐसे मैदानों में ही वह अपनी रफ्तार का पूरा फायदा उठा सकते हैं ।

दूसरे शिकारियों से अलग , यह दोपहर के वक्त अपने भोजन की तलाश में निकलते हैं । शायद यह सोची-समझी रणनीति है ‌। इसे शेरों तथा लकड़बग्घा के आमने-सामने की संभावनाएं कम हो जाती है ‌।

शिकार ढूंढने के लिए चीता अपने इलाके में आराम से गस्त लगाता है । चिता अपने सुनने की कमाल की शक्ति तथा अपनी तीखी नजर से शिकार का पता लगाते हैं ।

दूर से शिकार की पहचान कर लेना जरूरी होता है । वह दबे पांव पहुंचकर के पास जाते हैं तथा 100 मीटर के दायरे में पहुंचकर के चिता भाग करके हमला बोलता है ।

यदि शिकारी के झुंड में बच्चे होते हैं , तब चीता झुंड में से बच्चों को अलग करने की कोशिश करता है तथा शिकारी को दबोचने की कोशिश भी करता है ।

चीता कभी भी कमजोर तथा बीमार शिकारी पर हमला नहीं करता है । क्योंकि यह बाकी जानवरों से अलग होता है ।

चीते की दौड़ के दौरान उनके तलवे , जमीन से रगड़ के गर्म हो जाते हैं । चीते की शिकार की रणनीति उसकी शारीरिक रचना पर निर्भर करती है ।

लंबे पैरों की वजह से वह तेजी से दौड़ सकता है । लेकिन वह ज्यादा दूरी तय नहीं कर पाता है । 300 मीटर से कम ही की ही दूरी तक , तेजी बनाए रख सकता है ।

इसके बाद सांस फूलने लग जाती है तथा दिल तेजी से धड़कने लग जाता है । रुकना जरूरी हो जाता है । उसके पास और कोई विकल्प नहीं बचता है । इसलिए वह शिकार के बहुत पास जाने के बाद ही धावा बोलता है ।

इस समय चीते के शरीर का शारीरिक तापमान बहुत बढ़ जाता है । चीते को दुबारा शिकार पर हमला बोलने के लिए शरीर सामान्य अवस्था में होना चाहिए ।