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सूर्य के पुत्र और यम के भाई हैं शन‍ि, क्‍यों रहते हैं पिता से नाराज

सूर्य पुत्र शनि के जन्म की कहानी surya putra shani dev ke khani

एक समय की बात है जब सूर्य देव अपने साथ घोड़े वाले रथ पर सवार होकर पूरी तरह पृथ्वी को ऊर्जा तथा प्रकाश से दे रहे थे । उसी समय सूर्य देव के प्रकार ऊर्जा भी तेजी से बढ़ने लगी और सूर्य के ताप में भी वृद्धि होने लगी । इससे सभी धरती वासी तथा देवता परेशान होगे ।

तब सभी देवताओं ने मिलकर के शिव सागर में स्थित भगवान विष्णु के दरबार में पहुंचे । वहां पर उन सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से यह गुहार लगाई कि सूर्य देव के ताप को नियंत्रित किया जाए तथा सूर्य देव पर अंकुश लगाया जाए ।

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जानिए शनिदेव के जन्म की कथा

इस पर भगवान विष्णु ने सभी देवताओं से अनुरोध किया कि यदि सूर्य देव की शादी हो जाती है तब यह संभव हो सकता है । तब भगवान विष्णु ने बताया कि विश्वकर्मा की पुत्री संध्या का विवाह यदि सूर्य देव के साथ हो जाए तो सूर्य देव का ताप नियंत्रित हो सकता है । इस पर सभी सहमत भी हो गए । इस प्रकार सूर्य देव तथा संध्या का विवाह हुआ ।

सूर्य देव तथा संध्या के विवाह के पश्चात जब संध्या सूर्य देव के सम्मुख गई तब संध्या अपने पति सूर्यदेव का मुंह देख नहीं पा रही थी । क्योंकि सूर्य देव के मुख का तेज बहुत ज्यादा था । क्योंकि सूर्य देव का ताप बहुत ज्यादा था , जिसकी वजह से यह सूर्य देव का मुख नहीं देख पा रही थी ।

शादी के कई साल बाद तक भी सूर्य देव की पत्नी संध्या अपने पति का मुंह नहीं देख पाई थी अब तक संध्या के तीन संताने भी हो चुकी थी । जिसका नाम यम मनु और यमुना था ।

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इतना कुछ होने के बाद भी सूर्य देव की पत्नी संध्या सूर्य देव का मुक्त देख नहीं पाई थी और अभी तक सूर्य देव की तीन तीन संतान हो चुकी थी । इतने समय तक सूर्य देव के तेज का सामना करने के कारण अब संध्या भी काली पड़ गई थी । उसका मुंह तथा चेहरा काला हो गया था ।

अब तो सीमा बर्दाश्त से भी बाहर हो चुकी थी और सूर्य देव की पत्नी संध्या भी बहुत ज्यादा परेशान हो गई थी । अतः उसने अपना पतिव्रत धर्म निभाने के लिए निश्चय किया और उसने अपने प्रतिबिंब रूप को प्रकट किया । संध्या ने अपने छाया रूप को वही सूर्य देव के सूर्यलोक में ही छोड़ कर के वहां से चली गई।

संध्या तपस्या करने चली गई थी तथा वह लगातार तपस्या कर रही थी । लेकिन सूर्य देव को इस बात का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था कि उनकी पत्नी संध्या सूर्यलोक में नहीं है । उन्हें तो यह भी ज्ञात नहीं था कि उनके सामने जो संध्या के रूप में है वह संध्या नहीं है उसका प्रतिबिंब रूप है ।

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संध्या की अनुपस्थिति में तथा सूर्य देव को इस बात का ज्ञान न होने के कारण संध्या के प्रतिबिंब तथा सूर्य देव ने आपस में मिलन किया । जिसके फल स्वरुप शनि का जन्म हुआ । आपको पता ही है कि छाया काली होती है और सूर्य पुत्र शनि भी काले थे । क्योंकि उनका जन्म छाया से हुआ था जो कि संध्या का प्रतिरूप था

इस प्रकार छाया तथा सूर्य देव के मिलन से शनि का जन्म हुआ । जब सनी का जन्म हुआ तब सूर्यदेव को आश्चर्य हुआ कि मेरी मां की संतान तू गौर वर्ण की है जबकि सनी का वर्ण काला है ऐसा क्यों सूर्यदेव भी इस बात को लेकर दुविधा में थे । सनी का काला रंग होने के कारण सूर्य देव शनि से घृणा करते थे तथा वे उन्हें सही ढंग से अपना प्यार सदा दुलार नहीं देते थे ।

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जिसके कारण पिता तथा पुत्र में घृणा उत्पन्न होगी तथा वे एक-दूसरे के घोर शत्रु भी बन गए । लेकिन बाद में परिस्थितियां अनुकूल होने के कारण दोनों में आपसी मित्रता भी हो गई तथा पिता पुत्र का प्यार फिर से बन गया ।

सूर्य देव को छाया की असली सच्चाई का पता कब चला ?

एक सूर्य देव कहीं से लौट रहे थे । तब छाया ने सूर्य देव के स्वागत के लिए वहां पर पहुंची । जब छाया सूर्य देव की आरती उतार रही थी , तभी सूर्य देव की दृष्टि उसी के पास में स्थित जलकुंड पर पड़ी । जब सूर्य देव ने देखा कि जल में सिर्फ सूर्य देव का ही प्रतिबिंब दिखाई दे रहा है उसकी पत्नी का प्रतिबिंब नहीं दिखाई दे रहा है ।

तब सूर्यदेव को आश्चर्य हुआ और उन्होंने इस बात पर गौर किया । तब उन्होंने पाया कि इस संसार में सिर्फ छाया ही एक ऐसी वस्तु है जिसका प्रतिबिंब नहीं बनता है । तब सूर्यदेव ने छाया से पूछा कि तुम कौन हो ? तब जाकर के सूर्य देव को इस सच्चाई का पता चला ।

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