उड़ीसा में कोणार्क सूर्य मंदिर का रहस्य सात घोड़े वाला मंदिर भारत का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर

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उड़ीसा में कौन सा मंदिर है कोणार्क का सूर्य मंदिर कोणार्क सूर्य मंदिर किसने बनवाया

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इस मंदिर का निर्माण 1250 ईस्वी में राजा नरसिंह देव ने करवाया था । मंदिर की बनावट बहुत ही विशेष है । पूरे मंदिर को सूर्य भगवान के रथ के रूप में निर्मित किया गया है । जिसमें 24 पहिए है ।

प्रत्येक पहिए का व्यास 10 फीट है । इन पहिए की तीलियों पर विस्तृत नक्काशी की गई है । प्रत्येक पहिया एक पखवाड़े का प्रतीक है ।

सात घोड़े वाला भारत का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर

मंदिर को सात घोड़े खींच रहे हैं । दो शेर हाथी के ऊपर हमला करते हुए मंदिर के शीर्ष पर स्थित हैं ।

आरंभ में इस मंदिर को तीन हिस्सों में बनाया गया था

1 . विशाल सर्पिलाकार पहला भाग है
2 . पिरामिड जैसी छत वाला जगमोहन ।
3 . नाट्य मंडप इस के तीन प्रमुख हिस्से हैं ।

आज इस मंदिर के शिखरर लुप्त हो चुके हैं । जगमोहन तथा नाट्य मंडल अभी भी बचे हुए हैं । वह भी पूरे नहीं हैं । उनमें भी कई त्रुटियां हैं । यह उस समय के वैज्ञानिक तथा वास्तुकला का प्रमाण है ।

सात घोड़े सप्ताह के 7 दिनों के प्रतीक

यह मंदिर कालचक्र का प्रतीक है जो कि सूर्य देवता के प्रतीक से हमें जोड़ता है । सात घोड़े जो कि सूर्य मंदिर को सुबह की और पूर्वी दिशा से खींचते हैं । यह सप्ताह के 7 दिनों के प्रतीक हैं ।

रथ के 12 पहिए हैं जो कि साल के 12 महीनों को दर्शाते हैं । दूसरी दिलचस्प बात यह है कि यह साधारण पर यह नहीं है । बल्कि यह सूर्य घड़ी की है । कोई भी पहिए की छाया को देख करके सही समय का अंदाजा लगा सकता है ।

प्रत्येक पहिए में 8 तीलियां 24 घंटों को 8 बराबर भागों में बांटा गया

प्रत्येक पहिए में 8 तीलियां है । जिनमें 24 घंटों को 8 बराबर भागों में बांटा गया है । जिसके अनुसार दो तीलियों के बीच का अंतराल 3 घंटे का है । इस प्रकार कुल 8 लघु तिलियां है एक तिल्ली 90 मिनट को दर्शाती है ।

पहिए के किनारों को छोटे मनको से चयनित किया गया है । बड़ी और छोटी तीलियों के बीच 30 मनके हैं यदि 90 मिनट को 30 से विभाजित करते हैं तो हमें प्रत्येक मनके का मान मिलता है 3 मिनट ।

यह मनके काफी बड़े हैं । जिससे कि मनके के मध्य में या फिर मनके के किनारे पर पड़ने वाली छाया को देखा जा सकता है । इससे हम आगे भी समय को सटीकता से माप सकते हैं ।

मंदिर को 1200 कारीगरों ने 12 साल में बनाया

इस मंदिर को 1200 कारीगरों ने 12 साल में बनाया था । साक्ष्य से पता चलता है कि तीन विभिन्न प्रकार के पत्थरों का उपयोग इस मंदिर के के निर्माण में हुआ है । मंदिर के बड़े भाग में रूपांतरित चट्टान का प्रयोग किया गया है ।

क्लोराइड का उपयोग दरवाजे तथा कुछ मूर्तियों में किया गया है । लेटराइट का उपयोग मंदिर के अंदरूनी हिस्सों नींव , सिढियों , मंच के केंद्र में किया गया था ।

पत्थरों को सुचारू रूप से एक दूसरे के ऊपर क्षतीज रखा गया है । इन्हें आपस में लोहे से जोड़ा गया है ।

कारीगरी इतनी बेहतरीन की गई है कि यह जोड़ आसानी से दिखाई नहीं देते हैं । जोड़ लगने के बाद ही इन पर डिजाइन को उकेरा गया था ।

इस मंदिर की एक और खास बात है प्रत्येक दो पत्थरों के बीच लोहे की एक प्लेट लगाई गई है । मंदिर की ऊंची मंजिलों के निर्माण के लिए लोहे के भारि भिमों का उपयोग किया गया था ।

मंदिर के ढहने की कई धारणा प्रचलित है ।

एक धारणा के अनुसार कोणार्क मंदिर इसलिए गिरा क्योंकि यह पूर्ण नहीं था । इसके अलावा वास्तु कला दोष को भी इसके लिए जिम्मेदार माना जाता है ।

लेकिन मंदिर का जितना हिस्सा बचा है । वह भारत के स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना है ।

1 . गोवा के प्रसिद्ध चर्चों को लेटराइट पत्थर से बनाया गया है ।

2 . कोलकाता का मेमोरियल विक्टर मार्बल से बना है ।

3 . लाल किला तथा फतेहपुर सीकरी को लाल बलुआ पत्थर से बनाया गया है ।

4 . जयपुर का हवामहल भी बलुवा पत्थर से बनाया गया है । इन सभी के निर्माण की तकनीक के अलग-अलग है ।

5 . अन्य इमारतों को अन्य सामग्रियों जैसे कि ईंटों,पत्थरो मनाया गया था । जैसे कि सांची का महान स्तूप । यह आधा गोलीये केंद्रीय सरचना ईंटों से निर्मित थी ।

यहां पर बुध की निशानियां को रखा गया था । उसके बाद इस संरचना पर पत्थर लगाए गए थे । इससे पहली एवं दूसरी सदी में विस्तारित किया गया था ।

औपनिवेशिक काल की अनेक इमारतों को इसी प्रकार पत्थर से बनाया गया है ।